वॉशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी (Washington State University) के वैज्ञानिकों ने वायरस संक्रमण को रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। शोधकर्ताओं ने एक ऐसे अहम वायरल प्रोटीन में हस्तक्षेप करने का तरीका खोजा है, जिसकी मदद से वायरस मानव कोशिकाओं में प्रवेश करते हैं और बीमारी फैलाते हैं। यह खोज भविष्य में नई और प्रभावी एंटीवायरल थेरेपी विकसित करने का रास्ता खोल सकती है।
यह अध्ययन प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल Nanoscale में प्रकाशित हुआ है। शोध का फोकस उस विशेष आणविक (मॉलिक्यूलर) इंटरैक्शन पर था, जिसका उपयोग हर्पीज़ वायरस कोशिकाओं में प्रवेश के लिए करते हैं। इस शोध में वॉशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ मैकेनिकल एंड मटेरियल्स इंजीनियरिंग और डिपार्टमेंट ऑफ वेटरनरी माइक्रोबायोलॉजी एंड पैथोलॉजी के वैज्ञानिकों ने मिलकर काम किया।
अध्ययन के प्रमुख लेखक और प्रोफेसर जिन लियू के अनुसार, “वायरस बेहद चतुर होते हैं। कोशिकाओं में प्रवेश की प्रक्रिया बहुत जटिल होती है और इसमें कई तरह के इंटरैक्शन शामिल होते हैं। इनमें से अधिकतर जरूरी नहीं होते, लेकिन कुछ गिने-चुने इंटरैक्शन ऐसे होते हैं जो बेहद अहम भूमिका निभाते हैं।”
वायरस कैसे करता है कोशिकाओं पर हमला
शोध टीम ने हर्पीज़ वायरस के एक विशेष “फ्यूज़न प्रोटीन” का अध्ययन किया, जिसकी मदद से वायरस कोशिकाओं की झिल्ली के साथ जुड़कर अंदर प्रवेश करता है। यही प्रक्रिया कई तरह के वायरल संक्रमणों के लिए जिम्मेदार होती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बड़े और जटिल प्रोटीन की संरचना और इसके आकार में होने वाले बदलावों को अभी पूरी तरह समझा नहीं जा सका है। यही वजह है कि हर्पीज़ जैसे आम वायरस के खिलाफ वैक्सीन विकसित करना अब तक चुनौतीपूर्ण रहा है।
इस समस्या को सुलझाने के लिए शोधकर्ताओं ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और उन्नत मॉलिक्यूलर सिमुलेशन तकनीकों का सहारा लिया। प्रोफेसर जिन लियू और प्रोफेसर प्रशांत दत्ता ने इस वायरल प्रोटीन में मौजूद हजारों संभावित इंटरैक्शन का विश्लेषण किया। इसके लिए उन्होंने एक विशेष एल्गोरिद्म विकसित किया, जो प्रोटीन के मूल घटक यानी अमीनो एसिड्स के बीच होने वाले इंटरैक्शन का अध्ययन करता है।
मशीन लर्निंग से मिली कमजोर कड़ी
मशीन लर्निंग की मदद से वैज्ञानिकों ने हजारों इंटरैक्शन में से एक ऐसे अमीनो एसिड की पहचान की, जो वायरस के कोशिका में प्रवेश के लिए निर्णायक भूमिका निभाता है। इसके बाद प्रयोगशाला में इस अमीनो एसिड में एक लक्षित बदलाव (म्यूटेशन) किया गया।
डिपार्टमेंट ऑफ वेटरनरी माइक्रोबायोलॉजी एंड पैथोलॉजी के प्रोफेसर एंथनी निकोला के नेतृत्व में किए गए प्रयोगों में पाया गया कि इस एक छोटे से बदलाव के बाद वायरस कोशिकाओं के साथ फ्यूज़ नहीं हो पाया। नतीजतन, हर्पीज़ वायरस पूरी तरह से कोशिकाओं में प्रवेश करने में असफल रहा।
प्रोफेसर जिन लियू के मुताबिक, “हजारों इंटरैक्शन में से सिर्फ एक इंटरैक्शन सबसे अहम निकला। अगर हम सिमुलेशन और मशीन लर्निंग का इस्तेमाल नहीं करते और केवल ट्रायल-एंड-एरर के जरिए प्रयोग करते, तो इसमें कई साल लग सकते थे।”
आगे की चुनौतियां और शोध की दिशा
हालांकि शोधकर्ताओं ने इस महत्वपूर्ण इंटरैक्शन की पुष्टि कर दी है, लेकिन अभी यह समझना बाकी है कि यह छोटा सा बदलाव पूरे फ्यूज़न प्रोटीन की संरचना को किस तरह प्रभावित करता है। वैज्ञानिक आगे भी सिमुलेशन और मशीन लर्निंग की मदद से यह जानने की कोशिश करेंगे कि सूक्ष्म स्तर पर हुआ यह परिवर्तन बड़े स्तर पर प्रोटीन की संरचना को कैसे बदलता है।
जिन लियू कहते हैं, “प्रयोगशाला में जो देखा जाता है और सिमुलेशन में जो दिखता है, उसके बीच अभी भी एक अंतर है। अगला कदम यह समझना है कि यह छोटा इंटरैक्शन बड़े पैमाने पर संरचनात्मक बदलाव कैसे लाता है, जो हमारे लिए एक बड़ी चुनौती है।”
इस शोध में जिन लियू, प्रशांत दत्ता और एंथनी निकोला के साथ पीएचडी छात्र रायन ओडस्ट्रसिल, अल्बिना माकियो और मैकेना हल भी शामिल थे। इस परियोजना को नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ (NIH) से वित्तीय सहायता मिली।
यह खोज न केवल हर्पीज़ वायरस बल्कि भविष्य में अन्य वायरसों के खिलाफ भी नई एंटीवायरल रणनीतियों के विकास में मददगार साबित हो सकती है।
स्रोत: वॉशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी / जर्नल Nanoscale
Disclaimer :
यह समाचार शोध अध्ययन पर आधारित है। इसमें दी गई जानकारी केवल सामान्य वैज्ञानिक और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। किसी भी प्रकार के चिकित्सकीय उपचार या दवा के उपयोग से पहले विशेषज्ञ या डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।
