कुमाऊं की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान मानी जाने वाली बैठकी होली की शुरुआत पिथौरागढ़ में हो गई है। यह परंपरा रंगों से अधिक सुरों, भावों और शास्त्रीय संगीत की मधुरता के लिए जानी जाती है। बैठकी होली का यह आयोजन केवल एक दिन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका दौर लगभग तीन महीने तक चलता है, जिसमें विभिन्न राग-रागिनियों के माध्यम से होली के पद गाए जाते हैं।
बैठकी होली के शुभारंभ अवसर पर आयोजित होली मिलन समारोह में कुमाऊं अंचल के नैनीताल, अल्मोड़ा और चंपावत से आए होली गायन के दिग्गज कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियां दीं। इन कलाकारों ने पूरी रात खमाज, पीलू, जैजैवंती, भीमपलासी जैसे रागों पर आधारित बैठकी होलियों का गायन किया। हारमोनियम, तबला और मंजीरे की संगत में चली इस सुरमयी महफिल ने श्रोताओं को देर रात तक मंत्रमुग्ध किए रखा।
आयोजक पवन जोशी ने बताया कि इस वर्ष के आयोजन का विशेष उद्देश्य युवाओं को इस समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा से जोड़ना है, ताकि बैठकी होली की विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके। उन्होंने कहा कि युवाओं की बढ़ती भागीदारी से इस लोक-सांस्कृतिक धरोहर को नया जीवन मिल रहा है।
संगीतज्ञ प्रभात साह गंगोला के अनुसार, बैठकी होली के पदों में बृज और अवधी भाषा की स्पष्ट झलक देखने को मिलती है, जो इसे और भी विशेष बनाती है। उन्होंने बताया कि बैठकी होली के शुरुआती एक महीने में निर्वाण और भक्ति भाव से जुड़ी होलियों का गायन किया जाता है। इसके बाद बसंत पंचमी और महाशिवरात्रि के पश्चात इन होलियों में धीरे-धीरे श्रृंगार रस का समावेश होने लगता है, जिससे वातावरण और अधिक रंगीन और भावपूर्ण हो उठता है।
बैठकी होली न केवल कुमाऊं की सांस्कृतिक पहचान है, बल्कि यह लोकसंगीत, शास्त्रीय रागों और सामूहिक भावनाओं का ऐसा संगम है, जो समाज को एक सूत्र में बांधता है और परंपरा की गहराई को दर्शाता है।
