अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल Mahabodhi Temple, बोधगया के मुख्य द्वार की ओर जाने वाले मार्ग पर इन दिनों एक छोटी सी गुमटी देशी-विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। यहां ‘आकाश जीविका’ द्वारा संचालित स्टॉल पर नीरा और उससे बने उत्पादों की बिक्री हो रही है, जिसे पर्यटक खासा पसंद कर रहे हैं।
इस स्टॉल पर नीरा से तैयार गुड़ की चाय, तिलकुट, अनरसा, लाई और लड्डू उपलब्ध हैं। इन उत्पादों की मांग अब केवल बिहार तक सीमित नहीं रही, बल्कि अन्य राज्यों और विदेशी पर्यटकों के माध्यम से विदेशों तक भी पहुंच रही है। नीरा से बने गुड़ और तिलकुट की गुणवत्ता और स्वाद ने इसे खास पहचान दिलाई है।
इलरा गांव निवासी डब्ल्यू कुमार की सफलता की कहानी इसी पहल से जुड़ी है। पहले वे दूसरे राज्यों में दिहाड़ी मजदूरी करते थे, लेकिन राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू होने और नीरा उत्पादन को बढ़ावा मिलने के बाद उन्होंने नीरा से गुड़ और उससे विभिन्न मिठाइयां बनाने का कार्य शुरू किया। वर्ष 2023 में उन्होंने पहली बार नीरा का गुड़ तैयार कर तिलकुट बनाया। उनके उत्पाद की लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि स्वयं बिहार के मुख्यमंत्री Nitish Kumar इलरा गांव पहुंचे और नीरा तिलकुट का स्वाद चखा। मुख्यमंत्री की सराहना के बाद जिला प्रशासन और जीविका समूह की ओर से उन्हें बोधगया और गया में स्टॉल उपलब्ध कराया गया।
डब्ल्यू कुमार बताते हैं कि नीरा तिलकुट सामान्य तिलकुट की तरह ही बनाया जाता है, लेकिन इसमें चीनी या पारंपरिक गुड़ की जगह नीरा से तैयार गुड़ का उपयोग किया जाता है। इसकी खासियत यह है कि यह अपेक्षाकृत कम मीठा होता है, जिससे मधुमेह के मरीज भी सीमित मात्रा में इसका सेवन कर सकते हैं। हालांकि, इसे बनाने में अधिक मेहनत और समय लगता है।
पहले वे अकेले यह काम करते थे, लेकिन अब उनकी पत्नी और परिवार के अन्य सदस्य भी इस उद्यम से जुड़े हैं। इससे परिवार को घर बैठे रोजगार मिल रहा है और आय में भी वृद्धि हुई है। तिलकुट के मौसम में प्रतिदिन 150 किलोग्राम से अधिक नीरा तिलकुट की बिक्री हो चुकी है। इस वर्ष उन्होंने एक लाख लीटर से अधिक नीरा से गुड़ तैयार किया, जिससे तिलकुट के अलावा पेड़ा, लाई और चाय भी बनाई जा रही है।
कीमत की बात करें तो सामान्य तिलकुट 360 से 380 रुपये प्रति किलोग्राम बिकता है, जबकि नीरा तिलकुट 400 से 410 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से उपलब्ध है। पटना के Gandhi Maidan में आयोजित सारस मेले में भी बिहार सरकार की ओर से उन्हें स्टॉल प्रदान किया गया, जहां प्रतिदिन 70 से 100 किलोग्राम तक तिलकुट की बिक्री दर्ज की गई।
डब्ल्यू कुमार के अनुसार, ठंड के मौसम, पितृ पक्ष मेला और बोधगया में विशेष पूजा-अवसरों पर मांग काफी बढ़ जाती है। हालांकि, पूरे वर्ष इसका बाजार बना रहता है। विदेशी पर्यटक भी नीरा से बने तिलकुट को विशेष रूप से पसंद कर रहे हैं और अपने साथ स्मृति-चिह्न के रूप में ले जाते हैं।
उल्लेखनीय है कि अप्रैल 2016 में राज्य में शराब और ताड़ी पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद ताड़ी से जुड़े लोगों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया था। इसी के विकल्प के रूप में राज्य सरकार ने नीरा उत्पादन को बढ़ावा दिया। नीरा खजूर या ताड़ के पेड़ से सूर्योदय से पहले स्वच्छ मिट्टी के बर्तन ‘लबनी’ में निकाला जाता है। उचित देखभाल के साथ यह ताड़ी में परिवर्तित नहीं होता और इससे शुद्ध गुड़ तैयार किया जाता है।
आज नीरा से बना तिलकुट न केवल स्थानीय बाजार में बल्कि राज्य और देश के बाहर भी अपनी पहचान बना रहा है। यह पहल ग्रामीण स्वरोजगार, महिला सशक्तीकरण और पारंपरिक उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर उभरी है।
