वैज्ञानिकों ने कहा है कि मानव व्यवहार से बढ़ते जलवायु परिवर्तन ने वर्ष 2025 को अब तक के तीन सबसे गर्म वर्षों में शामिल कर दिया है। यह पहली बार है जब तीन वर्षों का औसत वैश्विक तापमान 2015 के पेरिस समझौते में तय की गई 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर गया है, जो औद्योगिक युग से पहले के स्तर के मुकाबले मानी जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पृथ्वी का तापमान इस सीमा के भीतर रखा जा सके, तो इससे लाखों जानें बचाई जा सकती हैं और दुनिया भर में होने वाली भीषण पर्यावरणीय तबाही को रोका जा सकता है।
यूरोप में मंगलवार को जारी वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन (WWA) के विश्लेषण के अनुसार, 2025 ऐसा वर्ष रहा जब दुनिया भर के लोग ग्लोबल वार्मिंग से उत्पन्न खतरनाक चरम मौसम घटनाओं की चपेट में रहे।
रिपोर्ट में कहा गया कि ला नीना जैसी प्राकृतिक शीतलन प्रक्रिया के बावजूद तापमान लगातार ऊंचा बना रहा। वैज्ञानिकों ने इसका मुख्य कारण जीवाश्म ईंधन—कोयला, तेल और गैस—का निरंतर उपयोग बताया, जिससे वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।
WWA की सह-संस्थापक और इम्पीरियल कॉलेज लंदन की जलवायु वैज्ञानिक फ्रेडरिके ओटो ने कहा कि यदि जीवाश्म ईंधनों का उपयोग बहुत जल्द और तेजी से बंद नहीं किया गया, तो वैश्विक तापमान को नियंत्रित करना बेहद कठिन हो जाएगा। उन्होंने कहा कि विज्ञान अब इस खतरे को लेकर लगातार अधिक स्पष्ट होता जा रहा है।
2025 में चरम मौसम की मार
चरम मौसम की घटनाएं हर वर्ष हजारों लोगों की जान लेती हैं और अरबों डॉलर का नुकसान पहुंचाती हैं। WWA वैज्ञानिकों ने 2025 में 157 अत्यधिक गंभीर मौसम घटनाओं की पहचान की, जिनमें से 22 का गहन विश्लेषण किया गया। इनमें जानलेवा हीटवेव, सूखा, जंगल की आग, भीषण बारिश, बाढ़ और शक्तिशाली चक्रवात शामिल थे।
रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में हीटवेव सबसे घातक चरम मौसम घटनाएं रहीं। कुछ हीटवेव ऐसी थीं, जिनकी संभावना जलवायु परिवर्तन के कारण एक दशक पहले की तुलना में 10 गुना तक बढ़ गई थी।
ग्रीस और तुर्की में लंबे सूखे के कारण भीषण जंगल की आग लगी, मैक्सिको में मूसलाधार बारिश और बाढ़ से दर्जनों लोगों की मौत हुई, जबकि फिलीपींस में सुपर टाइफून फंग-वोंग ने एक मिलियन से अधिक लोगों को विस्थापित कर दिया। भारत में मानसून के दौरान बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई।
WWA ने चेतावनी दी कि चरम मौसम की बढ़ती तीव्रता और आवृत्ति ने दुनिया भर के करोड़ों लोगों की अनुकूलन क्षमता की सीमाओं को चुनौती दी है। रिपोर्ट में हरिकेन मेलिसा का उदाहरण देते हुए कहा गया कि इसके अचानक तीव्र होने से पूर्वानुमान और आपदा प्रबंधन बेहद कठिन हो गया, जिससे कैरेबियाई देशों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
जलवायु वार्ताएं और वैश्विक राजनीति
नवंबर में ब्राजील में हुई संयुक्त राष्ट्र जलवायु वार्ताएं जीवाश्म ईंधन से दूरी बनाने के ठोस रोडमैप के बिना समाप्त हो गईं। हालांकि, जलवायु अनुकूलन के लिए वित्तीय सहायता बढ़ाने की बात कही गई, लेकिन इसके प्रभाव में समय लगेगा। विशेषज्ञों ने माना है कि वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा से आगे जा सकता है, हालांकि इसे पलटने की संभावना अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
चीन तेजी से सौर और पवन ऊर्जा का विस्तार कर रहा है, लेकिन साथ ही कोयले में निवेश भी जारी है। यूरोप में चरम मौसम के कारण जलवायु कार्रवाई की मांग बढ़ी है, जबकि अमेरिका में नीतियां जीवाश्म ईंधन के पक्ष में जाती दिखाई दे रही हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया भर में प्रगति तो हो रही है, लेकिन जलवायु संकट से निपटने के लिए कहीं अधिक ठोस और त्वरित कदम उठाने की आवश्यकता है।
Credit:
एपी (Associated Press) / World Weather Attribution रिपोर्ट पर आधारित
Disclaimer:
यह समाचार विभिन्न अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और वैज्ञानिक रिपोर्टों पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार और आकलन संबंधित विशेषज्ञों और शोध संस्थानों के हैं। प्रकाशन का उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना है।
