जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल तापमान और मौसम तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रकृति की सबसे सूक्ष्म प्रक्रियाओं को भी तेजी से बदल रहा है। स्वीडन की लुंड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में यह सामने आया है कि उत्तरी क्षेत्रों में पाई जाने वाली काई (मॉस) अब पहले की तुलना में कई हफ्ते पहले अपने बीजाणु हवा में छोड़ रही है। यह बदलाव पिछले लगभग 35 वर्षों में हुआ है और इसे जलवायु परिवर्तन का एक स्पष्ट जैविक संकेत माना जा रहा है।
इस शोध की सबसे खास बात यह है कि इसके लिए वैज्ञानिकों ने दशकों पुराने वायु नमूनों में संरक्षित डीएनए का उपयोग किया। ये वायु नमूने मूल रूप से 1960 के दशक से स्वीडिश सशस्त्र बलों द्वारा परमाणु हथियार परीक्षणों से उत्पन्न रेडियोधर्मी प्रभावों की निगरानी के लिए एकत्र किए गए थे। उस समय इनका उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा था, न कि पारिस्थितिकी अध्ययन। हालांकि, इन नमूनों में इस्तेमाल किए गए ग्लास फाइबर फिल्टरों में परागकण, बीजाणु और अन्य सूक्ष्म जैविक कणों का डीएनए सुरक्षित रह गया, जो आज वैज्ञानिकों के लिए एक अनोखा खजाना साबित हुआ।
उमेओ यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता पर स्टेनबर्ग ने सबसे पहले इस डीएनए संग्रह की वैज्ञानिक उपयोगिता को पहचाना। लुंड यूनिवर्सिटी के वनस्पति वैज्ञानिक निल्स क्रोनबर्ग के अनुसार, ये नमूने हवा के माध्यम से फैलने वाले जैविक कणों का एक अनोखा और रोमांचक डीएनए अभिलेख हैं, जिनसे लंबे समय में प्रकृति में आए बदलावों को समझा जा सकता है।
शोधकर्ताओं ने 35 वर्षों की अवधि में 16 विभिन्न काई प्रजातियों और समूहों का अध्ययन किया। विश्लेषण से पता चला कि औसतन काई अब वर्ष 1990 की तुलना में लगभग चार हफ्ते पहले बीजाणु छोड़ना शुरू कर देती है, जबकि बीजाणु फैलने का चरम समय लगभग छह हफ्ते पहले आ गया है। उत्तरी क्षेत्रों में, जहां गर्मियों की अवधि बहुत छोटी होती है, यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस अध्ययन में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। वैज्ञानिकों को उम्मीद थी कि जिस वर्ष बीजाणु फैलते हैं, उस वर्ष का वसंत तापमान या बर्फ पिघलने का समय सबसे अहम भूमिका निभाएगा। लेकिन परिणामों से पता चला कि असली प्रभाव पिछले वर्ष के मौसम का होता है, खासकर शरद ऋतु का। फिया बेंग्टसन, जो इस शोध के दौरान लुंड यूनिवर्सिटी में थीं और अब नॉर्वेजियन इंस्टीट्यूट फॉर नेचर रिसर्च से जुड़ी हैं, बताती हैं कि यदि शरद ऋतु अधिक गर्म रहती है, तो काई को सर्दियों से पहले अपने बीजाणु कैप्सूल विकसित करने के लिए अतिरिक्त समय मिल जाता है। यही कारण है कि वसंत आते ही बीजाणु पहले ही हवा में फैलने लगते हैं।
यह शोध केवल काई तक सीमित नहीं है, बल्कि पारिस्थितिकी अध्ययन के लिए एक बिल्कुल नया तरीका भी प्रस्तुत करता है। डीएनए आधारित इस पद्धति का उपयोग उन सभी पौधों और जीवों के अध्ययन में किया जा सकता है, जो अपने जैविक कण हवा में छोड़ते हैं। चूंकि स्वीडन में देशभर में लंबे समय से वायु नमूने एकत्र किए गए हैं, इसलिए वैज्ञानिक अब उत्तर से दक्षिण तक दशकों में आए पारिस्थितिक बदलावों की तुलना कर सकते हैं।
निल्स क्रोनबर्ग का मानना है कि 1970 के दशक के बाद से प्रकृति में आए इन परिवर्तनों की जानकारी भविष्य में जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) की रिपोर्टों का हिस्सा बन सकती है। यह अध्ययन इस बात का ठोस प्रमाण है कि जलवायु परिवर्तन के प्रति प्राकृतिक तंत्र कितनी तेजी से प्रतिक्रिया कर रहे हैं और यह बदलाव हमारी अपेक्षा से कहीं अधिक तेज हो सकता है।
क्रेडिट (Credit):
शोध सामग्री: लुंड यूनिवर्सिटी, स्वीडन
जर्नल: Journal of Ecology (2025)
लेखक: Fia Bengtsson, Nils Cronberg सहित अन्य शोधकर्ता
डिस्क्लेमर (Disclaimer):
यह लेख मूल वैज्ञानिक शोध पर आधारित है। सामग्री को समाचार शैली और सामान्य पाठकों की समझ के अनुसार संपादित और सरल किया गया है। शोध निष्कर्षों की व्याख्या में किसी भी प्रकार की वैज्ञानिक या चिकित्सकीय सलाह का उद्देश्य नहीं है।
