भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे के वैज्ञानिकों ने कैंसर उपचार में इस्तेमाल होने वाली टी-सेल आधारित थेरेपी को और प्रभावी बनाने के लिए एक नई और आसान तकनीक विकसित की है। इस तकनीक की मदद से लैब में तैयार की गई रोग प्रतिरोधक टी-कोशिकाओं को सुरक्षित तरीके से वापस निकाला जा सकता है, जिससे कैंसर उपचार की सफलता दर बढ़ने की उम्मीद है।
CAR T-cell जैसी आधुनिक इम्यूनोथेरेपी में मरीज के खून से टी-कोशिकाएं निकाली जाती हैं। इसके बाद इन कोशिकाओं को प्रयोगशाला में संशोधित कर बड़ी संख्या में विकसित किया जाता है और फिर मरीज के शरीर में वापस डाला जाता है, ताकि वे कैंसर कोशिकाओं को नष्ट कर सकें। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे चुनौतीपूर्ण चरण लैब में विकसित कोशिकाओं को सुरक्षित और सक्रिय अवस्था में वापस निकालना होता है।
आईआईटी बॉम्बे के बायोसाइंसेज और बायोइंजीनियरिंग विभाग की प्रोफेसर प्रकृति टायलिया ने बताया कि यह प्रक्रिया कागज पर आसान दिखती है, लेकिन वास्तविकता में कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाए बिना वापस निकालना बहुत बड़ी चुनौती है। यदि पर्याप्त मात्रा में स्वस्थ कोशिकाएं नहीं मिलतीं तो न तो सही परीक्षण संभव होता है और न ही प्रभावी उपचार हो पाता है।
शोधकर्ताओं ने शरीर के प्राकृतिक वातावरण जैसा माहौल तैयार करने के लिए इलेक्ट्रोस्पिनिंग तकनीक से बने विशेष स्कैफोल्ड का उपयोग किया। यह स्कैफोल्ड बेहद बारीक रेशों से बनी चटाई जैसा ढांचा होता है, जो देखने में मछली पकड़ने के जाल जैसा लगता है। यह ढांचा कोशिकाओं को बढ़ने और व्यवस्थित रूप से विकसित होने के लिए उपयुक्त वातावरण प्रदान करता है।
शोध टीम ने पॉलीकैप्रोलैक्टोन नामक सामग्री से बने इस स्कैफोल्ड में Jurkat टी-कोशिकाओं को विकसित किया। माइक्रोस्कोप से जांच करने पर पाया गया कि कोशिकाएं खुद ही इस ढांचे के अंदर चली जाती हैं और रेशों के बीच मजबूती से जुड़ जाती हैं।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि जब कोशिकाओं को ट्रिप्सिन नामक एंजाइम की मदद से निकाला गया तो काफी कोशिकाएं नष्ट हो गईं। वहीं, जब अक्यूटेज़ नाम के हल्के एंजाइम का इस्तेमाल किया गया तो ज्यादा कोशिकाएं सुरक्षित रहीं और स्वस्थ टी-कोशिकाओं की तरह काम करती रहीं।
शोध के दौरान यह भी देखा गया कि कोशिकाएं आपस में समूह बनाती हैं, जो उनके विभाजन और विकास का जरूरी चरण होता है। खास बात यह रही कि स्कैफोल्ड से निकालने के बाद भी ये कोशिकाएं अच्छी तरह बढ़ती रहीं और सक्रिय बनी रहीं।
प्रोफेसर टायलिया के अनुसार ट्रिप्सिन जैसे तेज एंजाइम कोशिकाओं की सतह पर मौजूद जरूरी प्रोटीन को नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिससे उनकी चिकित्सा में उपयोगिता कम हो सकती है। इसके विपरीत अक्यूटेज़ हल्का एंजाइम है, जो कोशिकाओं को सुरक्षित रखते हुए उन्हें अलग करने में मदद करता है।
यह महत्वपूर्ण शोध Biomaterials Science नामक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं का मानना है कि इस तकनीक से भविष्य में CAR T-cell जैसी उन्नत कैंसर थेरेपी के लिए कोशिकाएं तैयार करना अधिक आसान और प्रभावी हो सकेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस तरह की आधुनिक थेरेपी को बड़े स्तर पर मरीजों तक पहुंचाना है, तो हर चरण बेहद महत्वपूर्ण होता है। कोशिकाओं को सही तरीके से विकसित करना और सुरक्षित रूप से निकालना उपचार के परिणामों पर सीधा प्रभाव डालता है। यह शोध कैंसर उपचार के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
