नियाभर में लोग पहले की तुलना में अधिक उम्र तक जीवित रह रहे हैं, लेकिन अब लक्ष्य सिर्फ लंबी उम्र नहीं, बल्कि स्वस्थ और सक्रिय जीवन है। इसी सोच से “हेल्थस्पैन” पर वैज्ञानिकों का ध्यान तेजी से बढ़ा है—यानी जीवन का वह दौर जब व्यक्ति ऊर्जावान, स्वतंत्र और गंभीर उम्र-संबंधी बीमारियों से काफी हद तक मुक्त रहता है।
इस दिशा में शोध का एक अहम केंद्र माइटोकॉन्ड्रिया हैं, जिन्हें कोशिका का “पावरहाउस” कहा जाता है। माइटोकॉन्ड्रिया कोशिकाओं को ऊर्जा देने वाले एटीपी (ATP) का उत्पादन करते हैं। चूंकि उम्र बढ़ने और कई उम्र-संबंधी बीमारियों का सीधा संबंध माइटोकॉन्ड्रिया की घटती कार्यक्षमता से है, इसलिए वैज्ञानिक इन्हें स्वस्थ दीर्घायु की कुंजी मान रहे हैं।
माइटोकॉन्ड्रिया के भीतर ऊर्जा उत्पादन श्वसन श्रृंखला (respiratory chain complexes) पर निर्भर करता है। ये कॉम्प्लेक्स मिलकर बड़े और लचीले समूह बनाते हैं, जिन्हें माइटोकॉन्ड्रियल सुपरकॉम्प्लेक्स कहा जाता है। माना जाता है कि ये सुपरकॉम्प्लेक्स ऊर्जा उत्पादन को अधिक कुशल बनाते हैं, लेकिन अब तक पशु अध्ययनों से इसके सीधे स्वास्थ्य लाभों के ठोस प्रमाण सीमित थे।
इस सवाल का उत्तर तलाशने के लिए जापान के टोक्यो मेट्रोपॉलिटन इंस्टिट्यूट फॉर जेरियाट्रिक्स एंड जेरोन्टोलॉजी के वैज्ञानिक डॉ. सातोशी इनोए के नेतृत्व में एक टीम ने COX7RP नामक माइटोकॉन्ड्रियल प्रोटीन का अध्ययन किया। यह शोध, जिसमें साइटामा मेडिकल यूनिवर्सिटी के डॉ. काजुहिरो इकेडा भी सह-लेखक हैं, प्रतिष्ठित जर्नल Aging Cell (2025) में प्रकाशित हुआ।
शोधकर्ताओं ने ऐसे चूहे विकसित किए जिनमें जीवनभर COX7RP प्रोटीन का स्तर अधिक था। परिणाम चौंकाने वाले रहे। औसतन इन चूहों की उम्र सामान्य चूहों की तुलना में 6.6 प्रतिशत अधिक पाई गई। केवल उम्र ही नहीं, बल्कि उनका स्वास्थ्य भी बेहतर रहा। इनमें इंसुलिन संवेदनशीलता बढ़ी, रक्त में ट्राइग्लिसराइड और कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम रहा, मांसपेशियों की सहनशक्ति बेहतर हुई और लिवर में फैट जमा होने की समस्या भी कम देखी गई।
कोशिकीय स्तर पर इन चूहों में माइटोकॉन्ड्रियल सुपरकॉम्प्लेक्स की संख्या बढ़ी और एटीपी उत्पादन अधिक प्रभावी हुआ। सफेद वसा ऊतक (white adipose tissue) में उम्र बढ़ने से जुड़े कई नकारात्मक संकेतकों में कमी देखी गई, जैसे ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा करने वाले ROS का स्तर कम होना और सेलुलर एजिंग मार्कर β-galactosidase का घट जाना। साथ ही, उम्र से जुड़ी सूजन (inflammation) और सीनसेंस से संबंधित जीन गतिविधि भी कम पाई गई।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अध्ययन दिखाता है कि माइटोकॉन्ड्रिया की ऊर्जा दक्षता बढ़ाकर उम्र से जुड़ी कई समस्याओं को टाला या कम किया जा सकता है। डॉ. इनोए के अनुसार, भविष्य में ऐसे सप्लीमेंट या दवाएं विकसित की जा सकती हैं जो माइटोकॉन्ड्रियल सुपरकॉम्प्लेक्स के निर्माण और कार्यक्षमता को बढ़ाएं, जिससे हेल्थस्पैन और लाइफस्पैन दोनों को बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
यह शोध मधुमेह, मोटापा, डिस्लिपिडीमिया और अन्य मेटाबॉलिक रोगों के उपचार की दिशा में भी नई संभावनाएं खोलता है।
Credits:
Source: Tokyo Metropolitan Institute for Geriatrics and Gerontology
Journal: Aging Cell (2025)
Authors: Kazuhiro Ikeda et al.
DOI: 10.1111/acel.70294
Disclaimer:
यह लेख वैज्ञानिक शोध पर आधारित है और केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी निर्णय, उपचार या सप्लीमेंट के उपयोग से पहले योग्य चिकित्सक या विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।
