रोहतास जिले के करगहर स्थित शेरशाह अभियंत्रण महाविद्यालय में पराली जलाने से उत्पन्न प्रदूषण और मिट्टी की उर्वरता में हो रही गिरावट को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण जिला स्तरीय बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक का उद्देश्य किसानों को पराली जलाने के दुष्परिणामों के बारे में जागरूक करना और उन्हें टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना था।
बैठक में अधिकारियों और विशेषज्ञों ने एक स्वर में लोगों से पर्यावरण संरक्षण के प्रति सजग रहने और जिम्मेदारी निभाने की अपील की, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा और उपजाऊ भूमि विरासत में मिल सके। कृषि अभियंत्रण के उप निदेशक ने किसानों को विस्तार से समझाया कि कैसे पराली जलाने से पर्यावरण और मिट्टी दोनों को नुकसान होता है। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि वे पराली को जलाने के बजाय पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल करें, जैविक खाद बनाएं या आधुनिक मशीनों की मदद से इसे मिट्टी में मिला दें, जिससे फसल उत्पादन में वृद्धि होगी।
जिलाधिकारी उदिता सिंह ने इस अवसर पर चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि पिछले खरीफ मौसम में करगहर प्रखंड में पराली जलाने की 1214 घटनाएं दर्ज की गई थीं, जो पूरे जिले में सबसे अधिक है। उन्होंने अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए कि पराली जलाने के मामलों पर कठोर कार्रवाई की जाए। जिलाधिकारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो किसान पराली जलाते हुए पाए जाएंगे, उन पर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी और उन्हें सरकार की किसी भी अनुदान योजना से वंचित किया जा सकता है।
बैठक में स्थानीय जनप्रतिनिधियों और किसानों ने भी खुलकर अपने सुझाव दिए। कुछ जनप्रतिनिधियों ने इस मामले में और तेजी से कार्रवाई करने की मांग की, जबकि कृषि वैज्ञानिकों ने स्ट्रॉ-बैलर जैसी मशीनों को पराली प्रबंधन के लिए अत्यंत उपयोगी बताया। पैक्स अध्यक्ष ने सुझाव दिया कि मनरेगा मजदूरों की सहायता से किसानों को पराली हटाने में मदद मिलनी चाहिए, जिससे उन्हें आसानी हो और पराली जलाने की प्रवृत्ति कम हो सके।
बैठक में जिला, अनुमंडल और प्रखंड स्तर के कई अधिकारी, कृषि वैज्ञानिक, किसान सलाहकार, विभिन्न पंचायतों के मुखिया, पैक्स अध्यक्ष और बड़ी संख्या में किसान उपस्थित थे। सभी ने मिलकर इस समस्या का समाधान खोजने और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने का संकल्प लिया।
