राज्यसभा में मंगलवार को ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ पर विशेष चर्चा की शुरुआत से पहले सभापति सीपी राधाकृष्णन ने अपने भावपूर्ण उद्बोधन में इसे राष्ट्र की आत्मा और स्वतंत्रता संग्राम की धड़कन बताया। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत माता के प्रति समर्पण, त्याग और अदम्य साहस की अमर भावना है, जिसने गुलामी के कठिन दौर में करोड़ों भारतीयों के हृदय में आज़ादी की ज्योति निरंतर जलाए रखी।
सभापति ने कहा कि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह कालजयी गीत उस समय जन्मा जब राष्ट्र पर उपनिवेशवाद का भारी बोझ था। लेकिन समय के साथ यह गीत धर्म, भाषा और भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर पूरे देश को एक सूत्र में जोड़ने वाली ऊर्जा बन गया।
उन्होंने स्मरण कराया कि स्वतंत्रता सेनानियों के लिए वंदे मातरम् केवल प्रेरणा का स्रोत नहीं था, बल्कि कई वीरों की अंतिम पुकार भी—जब वे हंसते हुए फांसी के तख्ते पर चढ़ते समय देश के प्रति अपने प्रेम और बलिदान को व्यक्त करते हुए इसे उच्चारित करते थे। सभापति ने कहा कि इन ज्ञात–अज्ञात बलिदानियों की तपस्या इस गीत की हर पंक्ति में आज भी गूंजती है और हमें याद दिलाती है कि आज़ादी अटूट संकल्प और मातृभूमि के प्रति अथाह प्रेम से प्राप्त हुई है।
सीपी राधाकृष्णन ने महान कवि सुब्रमण्य भारती की उस प्रेरक पंक्ति को भी उद्धृत किया जिसमें कहा गया है कि वंदे मातरम् का स्वर दुनिया भर में तेजस्विता का प्रकाश फैलाता है। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् एक प्रण है—हमारी पहचान, हमारी एकता और हमारे सामूहिक भविष्य का।
देश के सभी बलिदानी वीरों को नमन करते हुए सभापति ने कहा कि उनका त्याग केवल इतिहास नहीं, बल्कि राष्ट्र की शाश्वत प्रेरणा शक्ति है। उन्होंने कहा कि इस विशेष चर्चा का आरंभ करते हुए हमें तीन सूत्र सदैव स्मरण रखना चाहिए—एकता हमारी शक्ति है, बलिदान हमारा मार्ग है और भारत माता हमारी आत्मा है।
अंत में सभापति ने सदन से आह्वान किया कि हम सब एक स्वर में राष्ट्र सेवा, एकता और गर्व का संकल्प लें और गर्व से उच्चारित करें—
वंदे मातरम्। वंदे मातरम्। वंदे मातरम्।
