प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सोमनाथ मंदिर पर लिखे गए लेख की शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने खुलकर प्रशंसा की है। उन्होंने कहा कि लगभग एक हजार वर्ष पहले सोमनाथ मंदिर को तोड़ने का पहला प्रयास किया गया था, लेकिन तमाम आक्रमणों और विध्वंस के बावजूद यह मंदिर आज भी पूरे गौरव और आस्था के साथ खड़ा है। शंकराचार्य ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने लेख में उस ऐतिहासिक पीड़ा, संवेदना और भावनाओं को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से शब्दों में पिरोया है, जिसे पढ़कर इतिहास के उस कालखंड की वेदना आज भी महसूस होती है।
मीडिया से बातचीत में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि प्रधानमंत्री का ब्लॉग सोमनाथ मंदिर पर हुए आक्रमण के समय अनुभव की गई पीड़ा को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है। उन्होंने बताया कि महमूद गजनवी ने अपनी सेना के साथ मंदिर पर आक्रमण कर भारी नुकसान पहुंचाया था। इस दौरान न केवल मंदिर को क्षति हुई, बल्कि पुजारियों और श्रद्धालुओं को भी अत्याचार झेलना पड़ा। गजनवी यह मानता था कि मंदिर और मूर्तियों को तोड़ देने से सनातन आस्था भी टूट जाएगी, लेकिन इतिहास ने सिद्ध कर दिया कि यह सोच गलत थी।
शंकराचार्य ने कहा कि प्रधानमंत्री ने अपने लेख के माध्यम से स्पष्ट संदेश दिया है कि मंदिर और मूर्तियां भले ही तोड़ी जा सकती हों, लेकिन सोमनाथ को नष्ट नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि गजनवी आया और चला गया, लेकिन एक हजार वर्ष बाद भी सोमनाथ अडिग खड़ा है। यह न केवल अतीत का सत्य है, बल्कि भविष्य के लिए भी एक चेतावनी है कि आस्था और संस्कृति को बलपूर्वक समाप्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने प्रधानमंत्री के इस प्रयास को स्वागत योग्य और प्रेरणादायक बताया।
इस दौरान शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने यह मांग भी उठाई कि देश में जहां-जहां महमूद गजनवी के नाम पर किसी स्थान या पहचान का नामकरण है, वहां से उसका नाम हटाया जाना चाहिए। उनका कहना था कि गजनवी ने कोई ऐसा कार्य नहीं किया, जिसे गौरव या सम्मान से जोड़ा जा सके।
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व – अटूट आस्था के 1,000 वर्ष’ शीर्षक से एक लेख लिखा था। अपने लेख में प्रधानमंत्री ने सोमनाथ मंदिर पर हुए आक्रमण को मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक बताया। उन्होंने लिखा कि वर्ष 1026 में हुए पहले आक्रमण, वहां के लोगों के साथ की गई क्रूरता और व्यापक विध्वंस का वर्णन कई ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है, जिन्हें पढ़कर आज भी मन विचलित हो उठता है।
प्रधानमंत्री ने अपने लेख में यह भी उल्लेख किया कि एक हजार वर्ष बाद भी सोमनाथ मंदिर पूरे वैभव के साथ खड़ा है। उन्होंने बताया कि 1026 के बाद अलग-अलग कालखंडों में मंदिर के पुनर्निर्माण के प्रयास होते रहे और अंततः वर्ष 1951 में मंदिर का वर्तमान स्वरूप साकार हुआ। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि 11 मई 1951 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोले गए थे। संयोग से वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने का भी वर्ष होगा।
प्रधानमंत्री के इस लेख के बाद सोमनाथ मंदिर के तीर्थ पुरोहितों और सोमपुरा ब्राह्मण समुदाय ने भी उनकी प्रशंसा की है। उनका कहना है कि एक हजार वर्ष पहले सोमनाथ की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीरों का स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपने गौरवशाली इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है।
