डिजिटल क्रांति आज एक विशाल और अनियोजित प्रयोग बन चुकी है, जिसमें बच्चे सबसे अधिक प्रभावित समूह के रूप में सामने आ रहे हैं। दुनिया भर में एडीएचडी (ADHD – अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर) के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। ऐसे में एक अहम सवाल उठ रहा है—क्या डिजिटल डिवाइस और खासतौर पर सोशल मीडिया का बढ़ता उपयोग इसके पीछे जिम्मेदार है?
इस सवाल का जवाब खोजने के लिए वैज्ञानिकों ने एक बड़े अध्ययन में करीब 8,000 बच्चों को शामिल किया। इन बच्चों को लगभग 10 वर्ष की उम्र से लेकर 14 वर्ष की उम्र तक ट्रैक किया गया। उनसे उनके डिजिटल उपयोग की आदतों के बारे में पूछा गया और उन्हें तीन श्रेणियों में बांटा गया—वीडियो गेमिंग, टीवी/वीडियो देखना (जैसे यूट्यूब) और सोशल मीडिया का उपयोग।
सोशल मीडिया श्रेणी में टिकटॉक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, एक्स (पूर्व ट्विटर), मैसेंजर और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म शामिल थे। इसके बाद यह विश्लेषण किया गया कि इन गतिविधियों का ADHD के दो प्रमुख लक्षणों—ध्यान की कमी (इनअटेंशन) और अति सक्रियता (हाइपरएक्टिविटी)—पर लंबे समय में क्या असर पड़ता है।
अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि सोशल मीडिया का उपयोग बच्चों में धीरे-धीरे ध्यान की कमी बढ़ने से जुड़ा पाया गया। इसके विपरीत, गेमिंग या वीडियो देखने का ऐसा कोई प्रभाव नहीं दिखा। यह परिणाम बच्चों के आनुवंशिक जोखिम और परिवार की आय जैसे कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी समान रहा।
शोधकर्ताओं ने यह भी जांचा कि क्या पहले से मौजूद ध्यान की कमी बच्चों को अधिक सोशल मीडिया इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करती है। लेकिन नतीजे बताते हैं कि ऐसा नहीं है। प्रभाव एकतरफा था—सोशल मीडिया का अधिक उपयोग बाद में ध्यान की समस्या को बढ़ाता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, यह प्रभाव केवल स्क्रीन देखने का नहीं है। अगर ऐसा होता, तो गेमिंग और वीडियो देखने से भी समान नुकसान दिखता। इससे यह धारणा भी कमजोर पड़ती है कि सभी डिजिटल माध्यम “डोपामिन हिट” देकर बच्चों का ध्यान खराब करते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि सोशल मीडिया की खास प्रकृति—लगातार नोटिफिकेशन, संदेशों की प्रतीक्षा और बार-बार ध्यान भटकना—इस समस्या की जड़ हो सकती है।
यहां तक कि जब कोई संदेश नहीं आता, तब भी यह सोच कि “शायद कोई मैसेज आया होगा” दिमाग को भटका देती है। जब यह स्थिति महीनों या वर्षों तक बनी रहती है, तो इसका दीर्घकालिक असर ध्यान क्षमता पर पड़ सकता है। इसके विपरीत, गेमिंग सीमित समय के सत्रों में होती है और इसमें एक समय पर एक ही काम पर फोकस करना पड़ता है।
हालांकि अध्ययन में पाया गया प्रभाव सांख्यिकीय रूप से बहुत बड़ा नहीं था। यह किसी सामान्य बच्चे को सीधे ADHD की श्रेणी में नहीं डालता। लेकिन अगर पूरी आबादी का औसत ध्यान स्तर थोड़ा-सा भी घटता है, तो बड़ी संख्या में बच्चे निदान की सीमा पार कर सकते हैं।
शोध के अनुसार, यदि पूरी आबादी में सोशल मीडिया का उपयोग प्रतिदिन औसतन एक घंटा बढ़ जाए, तो ADHD के मामलों में करीब 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो सकती है। यह एक सरलीकृत अनुमान है, लेकिन यह दिखाता है कि व्यक्तिगत स्तर पर छोटा असर भी सामूहिक रूप से बड़ा परिणाम दे सकता है।
आंकड़े बताते हैं कि पिछले 15–20 वर्षों में सोशल मीडिया उपयोग में कम से कम एक घंटा प्रतिदिन की बढ़ोतरी हुई है। दो दशक पहले सोशल मीडिया लगभग मौजूद नहीं था। आज किशोर औसतन पांच घंटे रोज ऑनलाइन रहते हैं, जिसमें अधिकांश समय सोशल मीडिया पर होता है।
2015 में जहां 24 प्रतिशत किशोर खुद को “लगातार ऑनलाइन” बताते थे, वहीं 2023 में यह आंकड़ा बढ़कर 46 प्रतिशत हो गया। विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया उपयोग में यह तेज़ उछाल पिछले 15 वर्षों में ADHD के बढ़ते मामलों की एक बड़ी वजह हो सकता है।
कुछ लोगों का तर्क है कि ADHD के मामलों में बढ़ोतरी केवल जागरूकता और सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ने के कारण है। यह आंशिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन यह संभावना को खत्म नहीं करता कि वास्तव में बच्चों में ध्यान की समस्या बढ़ रही है।
अब सवाल यह है कि आगे क्या किया जाए। अमेरिका में सोशल मीडिया अकाउंट बनाने की न्यूनतम आयु 13 वर्ष है, लेकिन इन नियमों को आसानी से तोड़ा जा सकता है। ऑस्ट्रेलिया इस दिशा में सबसे सख्त कदम उठा रहा है। 10 दिसंबर 2025 से वहां सोशल मीडिया कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उपयोगकर्ता की उम्र कम से कम 16 वर्ष हो। नियम तोड़ने पर कंपनियों पर भारी जुर्माना लगेगा।
अब दुनिया की नजर इस पर टिकी है कि ऑस्ट्रेलिया के इस कानून का क्या असर पड़ता है। संभव है कि भविष्य में अन्य देशों को भी इसी तरह के कड़े कदम उठाने पड़ें, ताकि बच्चों की ध्यान क्षमता और मानसिक स्वास्थ्य को सुरक्षित रखा जा सके।
Disclaimer:
यह समाचार वैज्ञानिक शोध और उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित है, जिसका उद्देश्य केवल सामान्य जानकारी और जन-जागरूकता बढ़ाना है। इसमें दी गई जानकारी को चिकित्सकीय सलाह या मानसिक स्वास्थ्य संबंधी निदान का विकल्प न माना जाए। एडीएचडी (ADHD) या ध्यान से जुड़ी किसी भी समस्या का मूल्यांकन और उपचार केवल योग्य चिकित्सक, मनोवैज्ञानिक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ द्वारा ही किया जाना चाहिए।
सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के प्रभाव व्यक्ति विशेष, उम्र, पारिवारिक वातावरण और अन्य कई कारकों पर निर्भर कर सकते हैं। किसी भी निष्कर्ष को सभी बच्चों या किशोरों पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता। पाठकों से आग्रह है कि वे बच्चों के डिजिटल उपयोग से संबंधित निर्णय सोच-समझकर लें और आवश्यकता होने पर विशेषज्ञ की सलाह अवश्य प्राप्त करें।
