प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडो-पैसिफिक कूटनीति को उस समय एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता मिली, जब जकार्ता में उनके सम्मान में आयोजित राजकीय भोज के दौरान इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने भारतीय विकास मॉडल की खुलकर सराहना की. मंगलवार को द्विपक्षीय वार्ता के बाद हुए इस भव्य समारोह में राष्ट्रपति प्रबोवो ने न केवल पीएम मोदी की नीतियों की प्रशंसा की, बल्कि यह भी स्वीकार किया कि उनका देश भारत की कई लोक-कल्याणकारी योजनाओं को अपने यहाँ लागू कर रहा है. दोनों देशों के बीच हुए कई रणनीतिक समझौतों के साथ ही पीएम मोदी को इंडोनेशिया के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से भी नवाजा गया.
इस कूटनीतिक मुलाकात का सबसे बड़ा प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की सॉफ्ट-पावर और नीतिगत नेतृत्व की स्वीकार्यता के रूप में सामने आया है. राष्ट्रपति प्रबोवो ने साफ किया कि भारत और इंडोनेशिया दोनों ही बड़ी आबादी, कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक आपदाओं जैसी एक जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. ऐसे में भारत की नीतियां विकासशील देशों के लिए एक व्यावहारिक ब्लूप्रिंट बन चुकी हैं.
इंडोनेशिया ने भारतीय प्रशासनिक और तकनीकी मॉडलों का गहराई से अध्ययन करना शुरू कर दिया है. हाल ही में जकार्ता से आए एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने भारत का दौरा कर शुष्क भूमि को उपजाऊ बनाने वाली भारतीय तकनीकों और ‘परमाकल्चर मॉडल’ का व्यावहारिक अध्ययन किया. कृषि और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में यह तकनीकी आदान-प्रदान आने वाले समय में दोनों देशों के बीच खाद्य सुरक्षा और द्विपक्षीय व्यापार को नए आयाम देगा.
भारत और इंडोनेशिया के संबंध सदियों पुराने सांस्कृतिक और व्यापारिक धागों से जुड़े हैं, लेकिन समकालीन भू-राजनीति में ‘इंडो-पैसिफिक मिशन’ ने इसे एक नया रणनीतिक मोड़ दे दिया है. प्रधानमंत्री मोदी का यह तीन दिवसीय दौरा दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने के उद्देश्य से हुआ है, जिसकी शुरुआत सोमवार को जकार्ता पहुंचने पर उनके भव्य स्वागत से हुई.
राष्ट्रपति प्रबोवो द्वारा पीएम मोदी को इंडोनेशिया का सर्वोच्च सम्मान ‘बिंतांग आदिपूर्णा ऑफ द रिपब्लिक ऑफ इंडोनेशिया’ दिया जाना यह दर्शाता है कि जकार्ता अब नई दिल्ली को इस क्षेत्र में एक प्रमुख और विश्वसनीय सुरक्षा व विकास साझेदार के रूप में देखता है. वैश्विक मंचों पर अक्सर देश अपनी नीतियों की नकल को गोपनीय रखते हैं, लेकिन प्रबोवो ने हल्के-फुल्के अंदाज में यह कहकर कि “भारत की योजनाओं पर कोई कॉपीराइट नहीं है,” यह संदेश दिया है कि वैश्विक दक्षिण (Global South) के देश अब आपसी सहयोग के लिए पश्चिमी देशों पर निर्भर रहने के बजाय एक-दूसरे के सफल मॉडलों को अपनाने में संकोच नहीं कर रहे हैं.
