राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने नागपुर में संघ के वार्षिक विजयादशमी उत्सव को संबोधित करते हुए विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और तकनीकी विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि सत्ता परिवर्तन के आंदोलन समस्याओं का समाधान नहीं करते और ये राजनीतिक स्वार्थों का औजार बनकर समाज में विभाजन बढ़ा सकते हैं।
आरएसएस प्रमुख के संबोधन के मुख्य बिंदु:
- सत्ता परिवर्तन और राजनीतिक आंदोलन: भागवत ने बांग्लादेश, नेपाल, फ्रांस और अल्बानिया की हिंसा का उदाहरण देते हुए कहा कि विरोध-प्रदर्शनों का उद्देश्य समाधान खोजना होना चाहिए, न कि कड़वाहट या सामाजिक विभाजन पैदा करना। उन्होंने नेताओं, प्रदर्शनकारियों और प्रशासन से संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करने की अपील की।
- ओटीटी और सोशल मीडिया पर नियमन: ओटीटी मंचों पर परोसी जा रही अनियंत्रित सामग्री पर चिंता जताते हुए उन्होंने सरकार से उचित नियम बनाने का आग्रह किया। उन्होंने युवाओं में विवेक और समझदारी विकसित करने पर जोर दिया।
- एआई और तकनीक के दुरुपयोग पर चिंता: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसका इस्तेमाल फर्जी वीडियो और झूठे प्रचार के लिए किया जा रहा है। उन्होंने तकनीक के प्रयोग में नैतिक सिद्धांतों की अनदेखी न करने की सीख दी।
- पर्यावरण और संतुलित विकास: नेपाल की बाढ़ का हवाला देते हुए उन्होंने हिमालयी क्षेत्र में एकतरफा विकास पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि केवल भौतिकवाद से प्रेरित विकास नुकसान पहुंचाता है।
- नशे की समस्या और राष्ट्रीय एकता: मादक पदार्थों की लत को गंभीर समस्या बताते हुए उन्होंने परिवारों और समाज से युवाओं में सही संस्कार डालने का आह्वान किया। भागवत ने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय एकता दिल का एक भावनात्मक बंधन है, कोई अनुबंध नहीं।
- हिंदू दृष्टिकोण की व्याख्या: उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘हिंदू दृष्टि’ किसी विशेष पूजा पद्धति, खान-पान या भाषा से परिभाषित नहीं होती, बल्कि यह सार्वभौमिक भाईचारे और मानवता में निहित है जो दुनिया को एकजुट करने की क्षमता रखती है।
