बागेश्वर जिले में चल रहे ऐतिहासिक उत्तरायणी मेले में लोहाघाट की पारंपरिक लोहे की कढ़ाहियां आधुनिक बर्तनों को कड़ी टक्कर देती दिखाई दे रही हैं। यह मेला केवल एक वार्षिक आयोजन भर नहीं है, बल्कि सदियों पुरानी पहाड़ी संस्कृति, लोकआस्था और पारंपरिक ज्ञान का जीवंत केंद्र है। इन परंपराओं में लोहे की कढ़ाहियां एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तनिर्मित रूप में बनाई जा रही हैं।
पहाड़ों में सदियों से परिवार लोहे की कढ़ाहियों में ही भोजन पकाते आए हैं, जिससे उन्हें प्राकृतिक रूप से आयरन मिलता रहा है। यही वजह है कि भट के डुबके, भट की दाल और हरी सब्जी जैसे पारंपरिक व्यंजन आज भी इन्हीं कढ़ाहियों में तैयार किए जाते हैं। स्थानीय लोग मानते हैं कि इन बर्तनों में बना भोजन न केवल स्वादिष्ट होता है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होता है।
उत्तरायणी मेले में लोहाघाट के कारीगर लंबे समय से अपने हाथों से बनाए गए लोहे के बर्तन लेकर आते रहे हैं। पिछले 45 वर्षों से मेले में व्यापार कर रहे आनंद राम ने बताया कि वह इस परंपरा को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह हुनर उन्होंने अपने पूर्वजों से सीखा है और इसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना उनका उद्देश्य है।
