नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के इंजीनियरों ने एक ऐसी क्रांतिकारी तकनीक विकसित की है जिसके माध्यम से प्रिंटेड कृत्रिम न्यूरॉन्स न केवल जैविक न्यूरॉन्स की नकल कर सकते हैं, बल्कि वे जीवित मस्तिष्क कोशिकाओं के साथ सीधे संवाद करने में भी सक्षम हैं। ये लचीले और कम लागत वाले उपकरण ऐसे विद्युत संकेत (इलेक्ट्रिकल सिग्नल) उत्पन्न करते हैं जो जीवित न्यूरॉन्स द्वारा पैदा किए गए संकेतों के बेहद करीब होते हैं, जिससे वे जैविक मस्तिष्क के ऊतकों को सक्रिय कर सकते हैं। शोधकर्ताओं ने चूहे के मस्तिष्क के स्लाइस पर किए गए प्रयोगों में पाया कि इन कृत्रिम न्यूरॉन्स ने वास्तविक न्यूरॉन्स में सफल प्रतिक्रियाएं पैदा कीं, जो इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और जीवित तंत्रिका तंत्र के बीच तालमेल के एक नए स्तर को प्रदर्शित करता है। यह उपलब्धि वैज्ञानिकों को ऐसे इलेक्ट्रॉनिक्स बनाने के करीब ले जाती है जो सीधे तंत्रिका तंत्र के साथ जुड़ सकें, जिसका उपयोग भविष्य में मस्तिष्क-मशीन इंटरफेस और न्यूरोप्रोस्थेटिक्स जैसे कि सुनने, देखने या चलने की क्षमता को बहाल करने वाले प्रत्यारोपणों में किया जा सकता है।
यह तकनीक न केवल चिकित्सा क्षेत्र बल्कि कंप्यूटर विज्ञान के लिए भी एक नई दिशा दिखाती है, क्योंकि यह मस्तिष्क से प्रेरित ऊर्जा-कुशल एआई (AI) हार्डवेयर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करती है। अध्ययन का नेतृत्व करने वाले प्रोफेसर मार्क सी. हरसम के अनुसार, वर्तमान एआई सिस्टम डेटा के विशाल भंडार पर निर्भर हैं जिससे बिजली की खपत की एक गंभीर समस्या पैदा हो गई है। चूंकि मानव मस्तिष्क एक डिजिटल कंप्यूटर की तुलना में पांच गुना अधिक ऊर्जा-कुशल है, इसलिए भविष्य की कंप्यूटिंग के लिए मस्तिष्क की संरचना को समझना अनिवार्य है। पारंपरिक सिलिकॉन चिप्स कठोर होते हैं और उनमें अरबों समान ट्रांजिस्टर लगे होते हैं जो एक बार बनने के बाद स्थिर रहते हैं, जबकि मस्तिष्क गतिशील और त्रि-आयामी नेटवर्क से बना होता है जो सीखने के साथ खुद को बदलता रहता है। इस अंतर को पाटने के लिए हरसम की टीम ने मोलिब्डेनम डाइसल्फाइड (MoS2) और ग्राफीन जैसे नैनोस्केल पदार्थों से बनी इलेक्ट्रॉनिक स्याही का उपयोग किया है, जिसे एयरोसोल जेट प्रिंटिंग के माध्यम से लचीली सतहों पर मुद्रित किया गया है।
इस शोध की सबसे खास बात यह है कि इन कृत्रिम न्यूरॉन्स द्वारा उत्पन्न विद्युत स्पाइक्स की टाइमिंग और आकार जैविक गुणों से पूरी तरह मेल खाते हैं, जो पहले विकसित किए गए जैविक या धात्विक ऑक्साइड आधारित न्यूरॉन्स में संभव नहीं था। यह किफायती और टिकाऊ निर्माण विधि न केवल कचरे को कम करती है बल्कि एआई के लिए आवश्यक भारी बिजली और पानी की खपत वाले डेटा सेंटरों का विकल्प भी पेश करती है। यह अध्ययन 15 अप्रैल को ‘नेचर नैनोटेक्नोलॉजी’ जर्नल में प्रकाशित होने वाला है और इसे नेशनल साइंस फाउंडेशन द्वारा समर्थित किया गया है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस तकनीक के माध्यम से वे एआई को अधिक स्मार्ट और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के साथ-साथ मानव शरीर के तंत्रिका संबंधी विकारों को ठीक करने में सफल होंगे।
Source: Northwestern University Credit Line: यह लेख नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी द्वारा प्रदान की गई सामग्री पर आधारित है और इसे शैली एवं लंबाई के अनुसार संपादित किया गया है।
Disclaimer: यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है और अत्याधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान पर आधारित है। इसमें दी गई जानकारी किसी भी चिकित्सीय उपचार, निदान या सर्जरी का विकल्प नहीं है। मस्तिष्क-मशीन इंटरफेस या न्यूरोलॉजिकल उपचार से संबंधित किसी भी निर्णय के लिए योग्य विशेषज्ञों और चिकित्सकों से परामर्श अवश्य लें। यह तकनीक अभी प्रयोगशाला स्तर पर अनुसंधान के अधीन है।
