राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। कभी बस्तर के घने जंगलों में हाथों में बंदूकें थामकर देश के खिलाफ लड़ने वाली महिला नक्सली आज समाज की मुख्यधारा में लौटकर रैंप पर कदम बढ़ा रही हैं। यह तस्वीर सिर्फ एक फैशन शो की नहीं, बल्कि बदलते भारत और बस्तर के पुनर्जन्म की एक नई कहानी बयान करती है।
जब पहली बार लगाई नेल पॉलिश तो छलक पड़े आंसू
इस पूरी यात्रा के सबसे भावुक क्षण का जिक्र करते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने एक बड़ा खुलासा किया। आत्मसमर्पण कर चुकीं इन पूर्व नक्सली महिलाओं में से एक लड़की को जब नेल पॉलिश दी गई, तो वह उसे लगाते हुए रो पड़ी। जब उसकी ट्रेनर ने उससे रोने का कारण पूछा, तो उसने रुंधे गले से जवाब दिया:
“मैंने अपने जीवन में पहली बार नेल पॉलिश लगाई है। जब मुझे ये लोग (नक्सली) उठाकर ले गए थे, तब मैं महज सात साल की थी। तब से लेकर आज तक मैं सिर्फ पैंट, शर्ट और भारी बूट्स में जंगलों में भटकती रही। मैंने कभी असली जिंदगी देखी ही नहीं।”
गृह मंत्री ने कहा कि वामपंथी विचारधारा के नाम पर देश के लगभग 15,000 बच्चों की जिंदगियों को इसी तरह तबाह कर दिया गया।
लाल सलाम से स्वदेशी लिनन तक का सफर
जो महिलाएं कभी जंगलों में वामपंथी विचारधारा, मार्क्स और लेनिन के साहित्य के जाल में फंसी हुई थीं, आज वे अपनी सदियों पुरानी संस्कृति और स्वदेशी हथकरघा वस्त्रों में अपनी पहचान बना रही हैं। अर्बन नक्सलियों और वामपंथी तंत्र के बहकावे में आकर अपने ही देश के खिलाफ हथियार उठाने वाली ये बेटियां अब आत्मसमर्पण कर अपने परिवारों का पालन-पोषण कर रही हैं और देश के विकास में योगदान दे रही हैं।
रायपुर में आयोजित इस फैशन शो में इन महिलाओं ने हथकरघा से बने पारंपरिक वस्त्र पहनकर पूरे आत्मविश्वास के साथ वॉक किया। यह दृश्य वामपंथी विचारधारा के उस दौर का सीधा जवाब है जब पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा था, “हम नक्सलियों से हथियार डालने के लिए नहीं कह रहे हैं क्योंकि हम जानते हैं कि वे ऐसा नहीं करेंगे।”
मुख्यधारा में लौटता बस्तर और मजबूत नेतृत्व
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में चलाए गए पुनर्वास और आत्मसमर्पण अभियानों के कारण हजारों नक्सलियों ने हथियार डालकर आत्मसमर्पण किया है। बस्तर की इन बेटियों का रैंप पर उतरना भारत की उस पुनर्वास नीति का प्रतीक है, जिसने हिंसा के रास्ते को विकास और सम्मानजनक जीवन में बदल दिया है।
यह दृश्य उन सभी भारत विरोधी ताकतों और वामपंथी तंत्र के लिए एक करारा जवाब है जो देश को हिंसा की आग में झोंकना चाहते थे। आज बस्तर की ये बेटियां न केवल आत्मनिर्भर हो रही हैं, बल्कि अपने कौशल और आत्मविश्वास से देश के इतिहास में बदलाव की एक नई इबारत लिख रही हैं।
