दीर्घकालिक (क्रोनिक) ब्लड कैंसर के मरीजों पर किए गए एक लंबे अध्ययन में वैज्ञानिकों को एक बड़ी सफलता मिली है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि स्थिर रहने वाले कैंसर और समय के साथ गंभीर रूप लेने वाले कैंसर के बीच प्रमुख आनुवंशिक (Genetic) अंतर होते हैं।
इस खोज की मदद से डॉक्टर अब बीमारी की पहचान में सुधार कर सकेंगे, मरीजों की सटीक निगरानी कर सकेंगे और लक्षण दिखने या बीमारी के बिगड़ने से कई साल पहले ही इसके संकेतों को पहचान सकेंगे।
क्या कहता है यह नया अध्ययन?
यह शोध ‘कैंसर डिस्कवरी’ (Cancer Discovery) जर्नल में प्रकाशित हुआ है, जिसे ‘वेलकम सेंगर इंस्टीट्यूट’ (Wellcome Sanger Institute) के वैज्ञानिकों और उनके सहयोगियों ने मिलकर पूरा किया है।
वैज्ञानिकों ने ‘मायलोप्रोलिफेरेटिव नियोप्लाज्म’ (MPNs) नामक एक दुर्लभ और धीरे-धीरे बढ़ने वाले ब्लड कैंसर से पीड़ित 30 मरीजों पर लगभग 25 सालों तक नजर रखी। उन्होंने 450 से अधिक नमूनों की जीनोम सीक्वेंसिंग की और मरीजों के लगभग 8,000 ब्लड टेस्ट रिकॉर्ड्स का विश्लेषण किया।
शोध से सामने आईं 3 बड़ी बातें
- बीमारी के बढ़ने के संकेत सालों पहले दर्ज हो जाते हैं: जिन मरीजों की बीमारी स्थिर रही, उनकी रक्त कोशिकाओं की आनुवंशिक स्थिति भी सालों तक ‘शांत’ रही। वहीं, जिन मरीजों की बीमारी आगे चलकर गंभीर रूप (जैसे ल्यूकेमिया या मायलोफाइब्रोसिस) में बदली, उनके डीएनए में समय के साथ नए उत्परिवर्तन (Mutations) देखे गए। ये बदलाव शारीरिक लक्षण बिगड़ने से कई साल पहले ही पहचाने जा सकते हैं।
- हर किसी को कैंसर नहीं होता (गलत निदान से बचाव): आमतौर पर MPNs कैंसर के मामले JAK2, CALR या MPL जींस में म्यूटेशन से जुड़े होते हैं। लेकिन 10% मरीजों में ये म्यूटेशन नहीं मिलते। शोध में पाया गया कि इनमें से कुछ लोगों की कोशिकाओं में कैंसर के बजाय सामान्य उम्र बढ़ने (Normal Aging) के लक्षण थे। यानी बिना म्यूटेशन वाले कई मरीजों को कैंसर न होने के बावजूद कीमोथेरेपी जैसा भारी इलाज झेलना पड़ता था।
- इलाज के नए दिशानिर्देश: इस खोज के आधार पर ब्रिटिश सोसाइटी फॉर हेमेटोलॉजी (BSH) ने नई गाइडलाइन्स जारी की हैं। अब बिना मुख्य म्यूटेशन वाले मरीजों को सीधे ब्लड कैंसर का मरीज मानने के बजाय ‘थ्रोम्बोसाइटोसिस’ (प्लेटलेट्स की अधिकता) की श्रेणी में रखकर निगरानी की जाएगी।
भविष्य में क्या बदलेगा?
भविष्य में नियमित जीनोमिक टेस्ट (DNA जांच) के जरिए डॉक्टर यह पहले ही जान सकेंगे कि किस मरीज को सख्त इलाज की जरूरत है और किसे नहीं। इससे उच्च जोखिम वाले मरीजों का समय रहते सही इलाज शुरू हो सकेगा और सामान्य मरीजों को बेवजह भारी दवाइयों या कीमोथेरेपी से बचाया जा सकेगा।
क्रेडिट: यह रिपोर्ट जर्नल कैंसर डिस्कवरी (Cancer Discovery) में प्रकाशित वेलकम सेंगर इंस्टीट्यूट (Wellcome Sanger Institute) और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल्स एनएचएस फाउंडेशन ट्रस्ट के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन पर आधारित है।
