भारत का मेडिकल डिवाइस (चिकित्सा उपकरण) उद्योग आने वाले वर्षों में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज करने के लिए तैयार है। फिक्की (FICCI) और DUA कंसल्टिंग द्वारा जारी एक नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में लगभग 14 अरब डॉलर का यह बाजार वर्ष 2047 तक 250 अरब डॉलर के स्तर पर पहुँच सकता है।
‘इंडिया मेडिकल डिवाइस 2026’ के 9वें संस्करण के दौरान ‘भारतीय हेल्थकेयर में मेडिकल इक्विपमेंट की सर्विस और मेंटेनेंस’ शीर्षक से यह रिपोर्ट जारी की गई। रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि यह उद्योग इस दशक के अंत (2030) तक ही 30 से 50 अरब डॉलर का आंकड़ा छू लेगा।
विकास को गति देने वाले मुख्य कारक
- बढ़ती स्वास्थ्य जरूरतें और तकनीक: अत्याधुनिक मेडिकल टेक्नोलॉजी को तेजी से अपनाने और स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती मांग से इस सेक्टर को रफ्तार मिल रही है।
- सरकारी नीतियां: ‘उत्पादन आधारित प्रोत्साहन’ (PLI) योजना और ‘मेडिकल डिवाइस उद्योग सुदृढ़ीकरण योजना’ जैसी पहलों ने घरेलू विनिर्माण (Domestic Manufacturing) और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बड़ा बढ़ावा दिया है।
- मेडटेक हब बनने की महत्वाकांक्षा: भारत को वैश्विक स्तर पर मेडटेक का प्रमुख केंद्र बनाने के प्रयास जारी हैं।
केवल निर्माण काफी नहीं, मेंटेनेंस और सर्विसिंग भी जरूरी
रिपोर्ट में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि इस उद्योग की दीर्घकालिक सफलता सिर्फ उपकरण बनाने से तय नहीं होगी। आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं में मेडिकल डिवाइसेज रोग की सटीक पहचान, आपातकालीन चिकित्सा और सर्जरी की रीढ़ बन चुके हैं। इसलिए:
- विश्वस्तरीय रखरखाव: उपकरणों की सर्विसिंग, कैलिब्रेशन (अंशांकन) और पूरे जीवनचक्र (Lifecycle) के प्रबंधन की मजबूत व्यवस्था होना बेहद जरूरी है।
- मरीजों की सुरक्षा: नियमित और वैज्ञानिक रखरखाव से डाउनटाइम (उपकरण खराब रहने का समय) कम होता है, कार्यक्षमता बढ़ती है और इलाज की गुणवत्ता में सुधार होता है।
रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें
- जोखिम-आधारित मेंटेनेंस ढांचा: सीडीएससीओ (CDSCO) के उपकरण वर्गीकरण के आधार पर जोखिम श्रेणी के अनुसार रखरखाव प्रोटोकॉल तय किए जाएं।
- इंजीनियरों का राष्ट्रीय प्रमाणन: सर्विस इंजीनियरों के लिए राष्ट्रीय स्तर की प्रमाणन व्यवस्था और बेहतर तकनीकी प्रशिक्षण लागू किया जाए।
- डिजिटल तकनीकों का उपयोग: खराबी को पहले से भांपने वाली पूर्वानुमान तकनीकों (Predictive Maintenance), डिजिटल निगरानी और डिजिटल जीवनचक्र प्रबंधन को अपनाकर अनियोजित डाउनटाइम को कम किया जाए।
