आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए आज का दिन एक बड़े राजनीतिक भूचाल जैसा रहा। पार्टी को तब एक जोरदार झटका लगा जब उसके तीन प्रमुख राज्यसभा सांसदों—राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अशोक मित्तल—ने औपचारिक रूप से पार्टी छोड़ने की घोषणा कर दी। नई दिल्ली में आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए राघव चड्ढा ने न केवल पार्टी छोड़ने का ऐलान किया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि वे और उनके साथ उच्च सदन (राज्यसभा) के कई अन्य सांसद अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थामने जा रहे हैं।
राज्यसभा में ‘विलय’ का दावा राघव चड्ढा ने इस बदलाव को एक संगठनात्मक विलय का नाम दिया। उन्होंने दावा किया कि राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के कुल 10 सांसद हैं और उनमें से दो-तिहाई से अधिक सदस्यों ने भाजपा में शामिल होने का सामूहिक निर्णय लिया है। उन्होंने बताया कि इस राजनीतिक कदम को औपचारिक रूप देने के लिए सभी आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी कर ली गई हैं। चड्ढा ने कहा, “हमने हस्ताक्षर करके सभी संबंधित दस्तावेज राज्यसभा के सभापति को सौंप दिए हैं।” यह कदम संसदीय राजनीति में आम आदमी पार्टी की स्थिति को कमजोर करने वाला माना जा रहा है।
पार्टी नेतृत्व पर गंभीर आरोप पार्टी छोड़ने के पीछे के कारणों को स्पष्ट करते हुए राघव चड्ढा ने आम आदमी पार्टी के वर्तमान स्वरूप पर तीखे प्रहार किए। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस आम आदमी पार्टी का गठन कभी भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने और राजनीति में शुचिता लाने के वादे के साथ हुआ था, आज वह पार्टी पूरी तरह से भ्रष्ट और समझौतावादी व्यक्तियों के चंगुल में फंस चुकी है। चड्ढा ने कहा कि पार्टी अपने मूल आदर्शों से भटक गई है और अब वे इस ‘भ्रष्ट तंत्र’ का हिस्सा बने रहने में सहज नहीं हैं। उन्होंने भविष्य की रणनीति पर जोर देते हुए कहा कि अब वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश के सर्वांगीण विकास और राष्ट्र निर्माण की दिशा में काम करना चाहते हैं।
सियासी गलियारों में हलचल यह घटनाक्रम आम आदमी पार्टी के लिए एक बड़े अस्तित्व के संकट के रूप में देखा जा रहा है। राज्यसभा में दो-तिहाई सांसदों का पार्टी छोड़ना न केवल संख्या बल को प्रभावित करेगा, बल्कि पार्टी की छवि और उसके राष्ट्रीय विस्तार की आकांक्षाओं पर भी गहरा असर डालेगा। चड्ढा के इस दावे के बाद कि पार्टी के अधिकांश सांसद भाजपा के साथ जुड़ने को तैयार हैं, दिल्ली और राष्ट्रीय राजनीति के गलियारों में हलचल तेज हो गई है। अब सभी की निगाहें राज्यसभा सभापति के आगामी फैसलों पर टिकी हैं कि वे इस विलय और इन इस्तीफों पर किस तरह की संवैधानिक कार्यवाही को आगे बढ़ाते हैं।
