दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग ने अपनी छह दिवसीय महत्वपूर्ण विदेश यात्रा संपन्न कर ली है, जो भारत और वियतनाम के साथ उनके देश के आर्थिक और रणनीतिक संबंधों में एक नया अध्याय लेकर आई है। यह यात्रा न केवल द्विपक्षीय संबंधों को गहरा करने के लिए थी, बल्कि यह दक्षिण कोरिया की एक बड़ी नीतिगत बदलाव की ओर इशारा करती है, जिसमें ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना और वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी स्थिति को सुरक्षित बनाना सर्वोपरि है।
मध्य पूर्व तनाव और ऊर्जा सुरक्षा की चिंता यह यात्रा ऐसे वैश्विक परिदृश्य में हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक तेल व्यापार का एक प्रमुख मार्ग है, पर मंडराते खतरों के कारण दक्षिण कोरिया जैसे देशों के लिए ऊर्जा सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बन गई है। राष्ट्रपति ली जे म्युंग की यात्रा का एक बड़ा उद्देश्य इसी अनिश्चितता के बीच कच्चे माल और ऊर्जा की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करना था। विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण कोरिया ने भारत और वियतनाम के साथ जुड़कर ‘ग्लोबल साउथ’ में अपनी सक्रियता बढ़ाई है और भू-राजनीतिक अस्थिरता का सामना करने के लिए एक मजबूत सुरक्षा घेरा तैयार करने की कोशिश की है।
भारत के साथ साझेदारी: शिपयार्ड से लेकर AI तक भारत में राष्ट्रपति ली जे म्युंग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक गहन द्विपक्षीय बैठक की। इस मुलाकात का मुख्य एजेंडा आर्थिक और तकनीकी सहयोग को नई ऊंचाइयों पर ले जाना था। दोनों देशों ने ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), रक्षा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण शिपबिल्डिंग और वित्त जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई।
बैठक का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम 15 समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर करना रहा। इसमें सबसे खास पहल भारत में संयुक्त रूप से शिपयार्ड बनाने की सहमति है, जो रक्षा और व्यापारिक दोनों दृष्टिकोण से भारत के लिए महत्वपूर्ण है। व्यापार को लेकर भी महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किए गए हैं; दोनों देशों ने व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) को अपग्रेड करने की प्रक्रिया को तेज करने का निर्णय लिया है, ताकि द्विपक्षीय व्यापार को वर्तमान 25 अरब डॉलर से बढ़ाकर 2030 तक 50 अरब डॉलर तक पहुंचाया जा सके।
वियतनाम: मैन्युफैक्चरिंग हब और परमाणु ऊर्जा की नई उम्मीद अपनी यात्रा के दूसरे चरण में, हनोई में राष्ट्रपति ली जे म्युंग ने वियतनाम के नेता तो लाम से मुलाकात की। राष्ट्रपति बनने के बाद यह ली की पहली विदेश यात्रा थी, जो वियतनाम के महत्व को रेखांकित करती है। वियतनाम न केवल दक्षिण कोरियाई कंपनियों के लिए एक प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग हब है, बल्कि यह चीन पर निर्भरता कम करने की रणनीति का एक अहम हिस्सा भी है।
वियतनाम के साथ संबंधों में ऊर्जा और तकनीक को प्रमुखता दी गई। दोनों देशों ने व्यापार को 150 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है, जो पिछले साल लगभग 95 अरब डॉलर था। इस यात्रा में परमाणु ऊर्जा सहयोग एक नया और उभरता हुआ आयाम साबित हुआ। वियतनाम अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को पुनर्जीवित करने की योजना बना रहा है और दक्षिण कोरिया ने इस दिशा में तकनीकी विशेषज्ञता, संयुक्त अध्ययन और फंडिंग में सहयोग करने का भरोसा दिलाया है।
राष्ट्रपति ली जे म्युंग की यह यात्रा मात्र औपचारिक कूटनीति नहीं थी, बल्कि यह दक्षिण कोरिया की ‘आर्थिक सुरक्षा’ की एक सोची-समझी रणनीति थी। भारत और वियतनाम के साथ इस बढ़ती साझेदारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य के आर्थिक और रणनीतिक गठबंधन अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि वे आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा और नई तकनीकी ऊंचाइयों पर आधारित होंगे।
