कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और अमेरिका तथा ईरान के बीच अप्रत्यक्ष वार्ता की खबरों से इस सप्ताह भारतीय शेयर बाजार में सकारात्मक माहौल देखने को मिला। इसी के चलते प्रमुख सूचकांकों में अच्छी बढ़त दर्ज की गई। सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन राष्ट्रीय शेयर सूचकांक बढ़त के साथ 23,719 के स्तर पर बंद हुआ, जबकि मुंबई शेयर सूचकांक भी मजबूती के साथ 75,415 अंक पर पहुंच गया। पूरे सप्ताह के दौरान बाजार में सीमित लेकिन स्थिर तेजी बनी रही।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि सुधार के बावजूद निवेशकों के बीच अभी भी सतर्कता बनी हुई है। ऊंचे स्तरों पर मजबूत खरीदारी नहीं होने के कारण बाजार की तेजी सीमित दायरे में रही। इस सप्ताह सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के शेयरों ने सबसे बेहतर प्रदर्शन किया। हाल के समय में आई गिरावट के बाद इन कंपनियों के मूल्यांकन आकर्षक स्तर पर पहुंचने से निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी। इसके अलावा रियल एस्टेट, सीमेंट और निजी बैंकिंग क्षेत्र के शेयरों में भी मजबूती बनी रही, जबकि उपभोक्ता वस्तु और टिकाऊ उपभोक्ता उत्पाद क्षेत्र दबाव में रहे। थोक महंगाई बढ़ने की आशंका के कारण कंपनियों के लाभ पर दबाव की चिंता भी बाजार में बनी रही।
मध्यम और छोटे आकार की कंपनियों के शेयरों ने बड़े सूचकांकों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया। बाजार में यह संकेत मिला कि निवेशक अब चुनिंदा क्षेत्रों में अवसर तलाश रहे हैं। कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और पश्चिम एशिया में तनाव कम करने के प्रयासों से भारतीय मुद्रा को भी कुछ समर्थन मिला। हालांकि बढ़ती लागत और सख्त मौद्रिक नीति की आशंकाओं के चलते घरेलू बॉन्ड प्रतिफल में बढ़ोतरी देखी गई।
विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिका के दीर्घकालिक सरकारी बॉन्ड प्रतिफल कई वर्षों के उच्च स्तर पर पहुंच गए हैं। इससे वैश्विक स्तर पर महंगाई, ऊंची ऊर्जा कीमतों और आर्थिक अनिश्चितता को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। इसके कारण यह आशंका मजबूत हुई है कि दुनिया भर में ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती हैं, जिसका असर वैश्विक तरलता और जोखिम वाले निवेशों पर पड़ सकता है।
बाजार जानकारों का कहना है कि राष्ट्रीय शेयर सूचकांक के लिए 23,800 से 24,000 का स्तर मजबूत अवरोध क्षेत्र बना हुआ है, जबकि 23,400 से 23,300 का स्तर महत्वपूर्ण सहारा माना जा रहा है। वहीं बैंकिंग सूचकांक के लिए 54,200 के आसपास तत्काल अवरोध देखा जा रहा है और 53,600 से 53,500 का दायरा मजबूत सहारा क्षेत्र माना जा रहा है।
विदेशी संस्थागत निवेशकों की ओर से इस सप्ताह भी बिकवाली जारी रही और बाजार से हजारों करोड़ रुपए की निकासी दर्ज की गई। अब निवेशकों की नजर अप्रैल महीने के औद्योगिक उत्पादन आंकड़ों पर टिकी हुई है। इन आंकड़ों से यह संकेत मिल सकता है कि विनिर्माण क्षेत्र में हाल की कमजोरी अस्थायी है या आगे भी बनी रह सकती है।
इसके अलावा भारतीय रिजर्व बैंक की जून महीने की मौद्रिक नीति और अमेरिका के महंगाई से जुड़े प्रमुख आंकड़े भी बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। यदि महंगाई के आंकड़े अपेक्षा से अधिक आते हैं, तो अमेरिका में ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कमजोर पड़ सकती है, जिससे उभरते बाजारों में विदेशी निवेश का प्रवाह सीमित रह सकता है।
