भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान को लेकर एक अहम स्पष्टीकरण जारी किया है। आयोग ने साफ किया है कि जिन पुराने मतदाताओं के नाम प्रारूप मतदाता सूची में नहीं हैं, वे अंतिम सूची में नाम जुड़वाने के लिए बिना किसी कानूनी डर के फॉर्म-6 जमा कर सकते हैं। केवल पहले से पंजीकृत होने के आधार पर उन पर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी।
फॉर्म-6 को लेकर क्यों थी संशय की स्थिति?
दरअसल, फॉर्म-6 में यह घोषणा करनी होती है कि आवेदक का नाम पहली बार मतदाता सूची में जोड़ा जा रहा है। इस वजह से पहले से पंजीकृत कई मतदाता फॉर्म भरने से हिचकिचा रहे थे, क्योंकि उन्हें डर था कि पुरानी प्रविष्टि होने के बावजूद यह घोषणा करने पर उन्हें कानूनी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का दिया हवाला
चुनाव आयोग ने यह निर्देश 14 अक्टूबर 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दिए गए ‘निलोत्पल दत्ता बनाम भारत निर्वाचन आयोग’ के फैसले के आधार पर जारी किया है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि पुराने मतदाताओं द्वारा फॉर्म-6 भरना गलत घोषणा की श्रेणी में नहीं आएगा, क्योंकि इसका उद्देश्य केवल एसआईआर प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची में नाम दोबारा दर्ज कराना है।
इन शर्तों का पालन करना अनिवार्य
आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह कानूनी संरक्षण तभी मिलेगा जब संबंधित मतदाता किसी अन्य विधानसभा या संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में एक साथ पंजीकृत न हो और उसका घोषणा-पत्र कानूनी प्रावधानों के अनुरूप हो।
स्थानीय भाषाओं में प्रचार के निर्देश
चुनाव आयोग ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEO) को निर्देश दिया है कि इस स्पष्टीकरण की जानकारी स्थानीय भाषाओं में व्यापक स्तर पर प्रसारित की जाए, ताकि मतदाताओं की सभी आशंकाएं दूर हो सकें।
