भारतीय अर्थव्यवस्था वर्तमान में कई मोर्चों पर दबाव का सामना कर रही है, जहां कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, कमजोर होता रुपया और मानसून संबंधी संभावित जोखिमों ने नीति निर्माताओं की चिंताएं बढ़ा दी हैं। वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 126 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई है, जिसने आयात लागत में भारी वृद्धि कर दी है। हालांकि सरकार ने आम जनता को राहत देते हुए रिटेल पेट्रोल और डीजल की कीमतों को फिलहाल स्थिर रखा है, लेकिन इसके विपरीत कमर्शियल एलपीजी की कीमतों में हुई तीखी बढ़ोतरी ने व्यापारिक जगत में हलचल पैदा कर दी है। ऊर्जा के इस बढ़ते खर्च का सीधा असर अब आम आदमी की जेब पर पड़ने लगा है क्योंकि परिचालन लागत बढ़ने के कारण बेंगलुरु जैसे प्रमुख शहरों के कई होटलों और रेस्तरां ने अपने खाने-पीने की वस्तुओं के दाम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं।
ऊर्जा संकट के साथ-साथ मुद्रा बाजार में रुपये की कमजोरी ने स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया है, जिससे न केवल ईंधन बल्कि अन्य जरूरी आयातित वस्तुओं की कीमतें भी प्रभावित हो रही हैं। कृषि क्षेत्र पर टिकी अर्थव्यवस्था के लिए मानसून की अनिश्चितता एक और बड़ा खतरा है, जो अगर प्रतिकूल रही तो खाद्य मुद्रास्फीति को और अधिक हवा दे सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें इसी उच्च स्तर पर बनी रहती हैं, तो आने वाले समय में राजकोषीय घाटे और चालू खाता घाटे (CAD) को नियंत्रित करना एक बड़ी चुनौती होगी। फिलहाल, होटल उद्योग द्वारा कीमतों में की गई वृद्धि इस बात का संकेत है कि इनपुट लागत का बढ़ता बोझ अब अंतिम उपभोक्ताओं की ओर स्थानांतरित होना शुरू हो गया है, जो आने वाले समय में व्यापक स्तर पर महंगाई बढ़ने का पूर्वाभास हो सकता है।
