प्रधानमंत्री मोदी ने मातृभूमि की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महिमा को नमन करते हुए एक संस्कृत सुभाषित साझा किया है। उन्होंने देश की महान परंपरा, प्राचीन संस्कृति और सर्वकल्याण की भावना का उल्लेख करते हुए कामना की कि भारत की पवित्र धरती सदैव सभी के जीवन में सुख, शक्ति और समृद्धि का संचार करती रहे।
प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि भारत केवल भौतिक वैभव की भूमि नहीं है, बल्कि यह साधना, उपासना, साहस और शक्ति की पुण्यभूमि भी रही है। उन्होंने कहा कि इस भूमि ने मानवता को संस्कृति, अध्यात्म और कल्याण का मार्ग दिखाया है। प्रधानमंत्री ने भारतीय विरासत को विश्व के लिए प्रेरणास्रोत बताते हुए देशवासियों के सुखद और समृद्ध भविष्य की कामना की।
उन्होंने अपने संदेश में संस्कृत का एक सुभाषित भी साझा किया—
“यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे यस्यां देवा असुरानभ्यवर्तयन्।
गवामश्वानां वयसश्च विष्ठा भगं वर्चः पृथिवी नो दधातु।।”
इस श्लोक के माध्यम से मातृभूमि की महानता का वर्णन किया गया है। इसमें कहा गया है कि यह वही पवित्र भूमि है जहां पूर्वजों ने महान कार्य किए और जहां देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की। श्लोक में पृथ्वी से प्रार्थना की गई है कि वह सभी को वैभव, शक्ति, तेज, पशुधन और समृद्धि प्रदान करे।
प्रधानमंत्री के इस संदेश को भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और राष्ट्रभावना से जोड़कर देखा जा रहा है। सामाजिक माध्यमों पर भी लोगों ने इस संस्कृत सुभाषित और उसके भावार्थ की सराहना की है।
