शुक्रवार को आर्टेमिस-2 मिशन की ऐतिहासिक चंद्र यात्रा सफलतापूर्वक पूरी होने और ओरियन कैप्सूल के प्रशांत महासागर में सुरक्षित लैंडिंग के बाद नासा ने अब अपने अगले बड़े लक्ष्य की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। अंतरिक्ष एजेंसी का अगला चरण चंद्रमा की सतह पर इंसानों को उतारना है, जिसके लिए वह अरबपति बिजनेसमैन जेफ बेजोस की कंपनी ‘ब्लू ओरिजिन’ और एलन मस्क की ‘स्पेसएक्स’ पर पूरी तरह निर्भर है। अपोलो कार्यक्रम के 50 से अधिक वर्षों के बाद अमेरिकी महत्वाकांक्षाएं अब और भी विशाल हो गई हैं क्योंकि नासा अब केवल दो अंतरिक्ष यात्रियों को कुछ दिनों के लिए नहीं, बल्कि चार लोगों को कई हफ्तों के लिए चांद पर भेजना चाहता है और भविष्य में वहां एक स्थाई आधार बनाने की योजना पर काम कर रहा है।
नासा ने आर्टेमिस मिशन के लिए दो अलग-अलग प्रणालियों का विकल्प चुना है जो इसे अपोलो युग से अलग बनाता है। जहां अपोलो के दौरान एक ही सैटर्न-V रॉकेट लैंडर और कैप्सूल दोनों को ले जाता था, वहीं आर्टेमिस में चालक दल को ले जाने वाला ओरियन अंतरिक्ष यान अलग से लॉन्च होगा और निजी कंपनियों द्वारा विकसित चंद्र लैंडर अलग से अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे। नासा के वरिष्ठ अधिकारी केंट चोजनैकी ने बताया कि अपोलो मिशन किसी ‘कैंपिंग ट्रिप’ की तरह थे जिन्हें लंबी अवधि तक रुकने के लिए विकसित नहीं किया गया था, जबकि नए विकसित किए जा रहे लैंडर अपोलो लैंडर की तुलना में दो से सात गुना बड़े हैं। इस नए दृष्टिकोण ने संसाधनों तक पहुंच तो बढ़ाई है लेकिन साथ ही ऑपरेशंस को बहुत जटिल बना दिया है क्योंकि इन विशाल यानों को चांद तक भेजने के लिए ‘इन-फ़्लाइट रिफ्यूलिंग’ यानी अंतरिक्ष में ईंधन भरने की तकनीक में महारत हासिल करनी होगी, जिसका अभी पूर्ण परीक्षण होना बाकी है।
मिशन की जटिलता और स्पेसएक्स जैसे भागीदारों की ओर से होने वाली देरी ने नासा पर दबाव बढ़ा दिया है, खासकर तब जब चीन 2030 तक चंद्रमा पर पहुंचने की तैयारी में तेजी से आगे बढ़ रहा है। अंतरिक्ष विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि देरी जारी रही तो अमेरिका चंद्रमा की दौड़ में पिछड़ सकता है। इसी दबाव के बीच नासा ने 2028 में मानव लैंडिंग का लक्ष्य रखा है और निजी क्षेत्र से अपनी उत्पादन लाइनों में तेजी लाने का आग्रह किया है। इस महत्वाकांक्षी समय सीमा के भीतर कंपनियों को अंतरिक्ष में ईंधन भरने का परीक्षण करना होगा और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पहले एक मानव रहित लैंडर चांद पर भेजना होगा। हालांकि नासा के पास विफलता की स्थिति में बैकअप योजनाएं मौजूद हैं, लेकिन अंतरिक्ष विशेषज्ञों का मानना है कि दो साल का समय इस तरह के जटिल परीक्षणों के लिए बहुत कम है।
