किसी भी देश की प्रगति का वास्तविक आकलन केवल उसकी आर्थिक वृद्धि या बुनियादी ढांचे से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के स्वास्थ्य, कार्यक्षमता और जीवन की गुणवत्ता से होता है। स्वस्थ और पोषित आबादी देश के सामाजिक एवं आर्थिक विकास का मुख्य आधार है। इसी महत्व को रेखांकित करने के लिए भारत में हर साल 1 से 7 सितंबर तक राष्ट्रीय पोषण सप्ताह मनाया जाता है, जिसकी शुरुआत 1982 में हुई थी।
आज भारत कुपोषण की दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है—एक ओर अल्पपोषण और एनीमिया, तो दूसरी ओर शहरों में अस्वास्थ्यकर खान-पान से बढ़ता मोटापा।
पोषण का अर्थ केवल पेट भरना नहीं
पोषण का मतलब केवल भूख मिटाना नहीं, बल्कि शरीर को आवश्यक प्रोटीन, विटामिन, आयरन और कैल्शियम जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व देना है। भोजन की पर्याप्त मात्रा के बावजूद पोषक तत्वों की कमी को ‘छिपी भूख’ (Hidden Hunger) कहा जाता है। यह विशेषकर बच्चों के मानसिक व शारीरिक विकास और महिलाओं के स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित करती है।
कुपोषण की दोहरी चुनौती और जीवन के पहले 1,000 दिन
भारत में बच्चों में स्टंटिंग, वेस्टिंग और महिलाओं में एनीमिया जैसी समस्याएं अब भी मौजूद हैं, वहीं प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों और स्क्रीन टाइम के कारण मोटापा भी बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, गर्भावस्था से लेकर बच्चे के 2 वर्ष की उम्र तक का समय (पहले 1,000 दिन) पोषण की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण होता है। शुरुआती छह महीने तक केवल स्तनपान और तत्पश्चात पूरक आहार बच्चे के सर्वांगीण विकास की नींव रखता है।
मातृ पोषण, एनीमिया और स्थानीय भोजन में समाधान
किशोरियों और महिलाओं का पोषण सीधे अगली पीढ़ी के स्वास्थ्य से जुड़ा है। भारत में एनीमिया एक बड़ी समस्या है, जिससे निपटने के लिए हरी पत्तेदार सब्जियां, दालें और आयरन युक्त आहार जरूरी है।
पोषण के लिए महंगे खाद्य पदार्थों की आवश्यकता नहीं है। हमारे पारंपरिक स्थानीय विकल्प—जैसे मोटे अनाज (श्रीअन्न), मौसमी फल और दालें—अत्यंत पौष्टिक और किफायती समाधान प्रदान करते हैं।
बदलती जीवनशैली, गैर-संचारी रोग और स्वच्छता
शहरों में फास्ट फूड और निष्क्रिय जीवनशैली से मोटापा, मधुमेह और उच्च रक्तचाप (बीपी) जैसी बीमारियों का जोखिम बढ़ा है। इसके अलावा, दूषित पानी और अस्वच्छता भी बच्चों में बार-बार संक्रमण फैलाकर कुपोषण का कारण बनती है। अतः पोषण नीति को स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता अभियानों से जोड़ना अनिवार्य है।
सरकारी प्रयास और समुदाय की भूमिका
सरकार ‘पोषण 2.0’ और ‘पोषण ट्रैकर’ जैसी डिजिटल प्रणालियों के माध्यम से योजनाओं की निगरानी कर रही है। इसमें आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और स्कूलों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। हालांकि, कुपोषण को केवल सरकारी योजनाओं से खत्म नहीं किया जा सकता; इसके लिए परिवार, स्कूल और समुदाय की सक्रिय भागीदारी से पोषण को एक ‘जन आंदोलन’ बनाना होगा।
आगे की राह
भारत को एक ‘जीवन-चक्र आधारित रणनीति’ अपनानी होगी। जलवायु परिवर्तन और आर्थिक असमानता के बीच हर वर्ग तक पौष्टिक भोजन की पहुंच सुनिश्चित करना समय की मांग है। पोषित और स्वस्थ नागरिक ही विकसित भारत की सबसे मजबूत नींव हैं।
