बिहार के सहरसा जिले की बहू रेणुका मिश्रा ने पारंपरिक नौकरी के रास्ते से हटकर उद्यमिता की नई मिसाल कायम की है। चार्टर्ड एकाउंटेंट (सीए) की नौकरी छोड़कर उन्होंने सुपरफूड मखाना के व्यवसाय में कदम रखा और महज पांच वर्षों में ही करोड़पति बन गईं। उनकी यह सफलता कहानी न सिर्फ महिलाओं, बल्कि युवाओं और किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही है।
कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान रेणुका मिश्रा ने सहरसा जिले के कहरा प्रखंड स्थित बलहा गढ़िया गांव में बड़े पैमाने पर मखाना की खेती देखी। यहीं से उन्हें मखाना को सिर्फ कच्चे उत्पाद के बजाय वैल्यू एडेड प्रोडक्ट बनाकर देश-विदेश के बाजारों तक पहुंचाने का विचार आया। उन्होंने मखाना को एक ग्लोबल ब्रांड बनाने का संकल्प लिया।
मखाना उद्योग की शुरुआत के लिए रेणुका ने उद्योग विभाग से प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) के तहत 25 लाख रुपये का ऋण लिया। अक्टूबर 2020 में शुरू हुआ यह कारोबार आज लगभग साढ़े सात करोड़ रुपये के टर्नओवर तक पहुंच चुका है।
रेणुका मिश्रा ने बलहा गढ़िया (सहरसा), हरदा (पूर्णिया) और आशापुर (दरभंगा) में मखाना प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की। किसानों से मखाना की गुड़िया (गुर्री) खरीदकर दरभंगा की आशापुर यूनिट में फोड़ाई कर लावा तैयार किया जाता है। वहीं बलहा गढ़िया और हरदा यूनिट में लावा की गुणवत्ता सुधारने और खराब दानों की छंटाई का काम किया जाता है।
इसके बाद उत्तर प्रदेश के नोएडा स्थित प्रोसेसिंग यूनिट में मखाना के लावा को भूनकर टोमेटो, हिमालयन सॉल्ट, पेरी-पेरी, क्रीम एंड ओनियन, मिल्क, पुदीना सहित कुल 13 फ्लेवर में पैकेज किया जाता है। इसके अलावा रेडी-टू-ईट मखाना खीर और बेकरी उत्पाद भी तैयार किए जा रहे हैं।
रेणुका मिश्रा के उत्पाद आज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी पहचान बना चुके हैं। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, झारखंड, ओडिशा और उत्तराखंड सहित कई राज्यों में इनके उत्पादों की नियमित आपूर्ति की जा रही है, वहीं विदेशों में भी मखाना उत्पादों का निर्यात किया जा रहा है।
इस मखाना उद्योग से वर्तमान में करीब 50 मजदूरों को रोजगार मिला है। यहां कार्यरत मजदूर संजू देवी बताती हैं कि वे पिछले चार वर्षों से यहां काम कर रही हैं और घर के पास ही रोजगार मिलने से उनके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है। वहीं पिंकी कुमारी ने भी कहा कि रेणुका मिश्रा के साथ काम कर उन्हें आत्मसम्मान और स्थिर आय मिली है।
रेणुका मिश्रा की यह यात्रा बताती है कि सही सोच, स्थानीय संसाधनों का उपयोग और सरकारी योजनाओं का सहयोग मिल जाए, तो ग्रामीण भारत से भी वैश्विक सफलता हासिल की जा सकती है।
