मोतिहारी स्थित महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय (एमजीसीयू) के अंग्रेज़ी विभाग द्वारा ‘भारतीय एवं पाश्चात्य सौंदर्यशास्त्र’ विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन कुलपति प्रो. संजय श्रीवास्तव, प्रो. बिमलेश कुमार सिंह, प्रो. विकास शर्मा (चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ) और प्रो. भवतोश इंद्र गुरु (डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय) ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया।
इस अवसर पर देश के विभिन्न प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से आए विद्वानों, शिक्षकों और विद्यार्थियों ने साहित्य, कला और सौंदर्यबोध के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार साझा किए। संगोष्ठी में भारतीय और पाश्चात्य सौंदर्यशास्त्र की परंपराओं, आधुनिक संदर्भों और भविष्य की संभावनाओं पर गहन चर्चा की गई।
संगोष्ठी के मुख्य संरक्षक और कुलपति प्रो. संजय श्रीवास्तव ने कहा कि तकनीकी प्रगति और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के बढ़ते प्रभाव के बावजूद साहित्य, कला और काव्य की सूक्ष्म भावनात्मक गहराइयों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता पूरी तरह नहीं समझ सकती। उन्होंने शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक ‘मैकबेथ’ और कालिदास की रचनाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि सौंदर्य की वास्तविक अनुभूति केवल मानवीय संवेदनाओं के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने भारतीय संस्कृति और सभ्यता की समृद्ध विरासत को वैश्विक मंच पर मजबूती से प्रस्तुत करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। साथ ही उन्होंने नाट्यशास्त्र को वैश्विक सांस्कृतिक संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बताते हुए अंग्रेज़ी विभाग की इस शैक्षणिक पहल की सराहना की और विद्यार्थियों से ऐसे कार्यक्रमों का अधिक से अधिक लाभ उठाने का आह्वान किया।
संगोष्ठी के संयोजक और अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष प्रो. बिमलेश कुमार सिंह ने कहा कि सृष्टिकर्ता पूर्ण है और उससे उत्पन्न प्रत्येक वस्तु में सौंदर्य निहित है। उन्होंने कहा कि साहित्य में सौंदर्य केवल विषयवस्तु में ही नहीं, बल्कि उसकी प्रस्तुति और अभिव्यक्ति शैली में भी दिखाई देता है। उन्होंने वर्तमान समय को “सौंदर्यबोध के संकट” का दौर बताते हुए कहा कि यह संगोष्ठी सौंदर्य चेतना को पुनर्जीवित करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों के डीन, विभागाध्यक्ष, शिक्षक, शोधार्थी और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी को साहित्य और सौंदर्यशास्त्र के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण अकादमिक पहल माना जा रहा है।
