भारत में कैसे आई IVF टेक्नोलॉजी: कितनी सक्सेसफुल है ये प्रक्रिया; खर्च से लेकर खतरा तक जानिए
29 मई 2022, पंजाब के मशहूर गायक सिद्धू मूसेवाला की हत्या की खबर सामने आई. इस खबर ने न सिर्फ पंजाब बल्कि पूरे भारत को शोकाकूल कर दिया था. सिद्धू मूसेवाला अपने माता-पिता के इकलौते संतान थे.
29 मई 2022, पंजाब के मशहूर गायक सिद्धू मूसेवाला की हत्या की खबर सामने आई. इस खबर ने न सिर्फ पंजाब बल्कि पूरे भारत को शोकाकूल कर दिया था. सिद्धू मूसेवाला अपने माता-पिता के इकलौते संतान थे. उनकी मौत के बाद उनकी मां चरण कौर और पिता बलकौर सिंह अकेले हो गए थे.
अब इस घटना के दो साल बाद एक बार फिर सिद्धू चर्चा में हैं और इस बार उनके नाम के साथ एक खुशखबरी भी जुड़ी है. दरअसल हाल ही में सिद्धू मूसेवाला की मां ने एक बच्चे को जन्म दिया है. मूसेवाला की नाम 56 साल की हैं और उन्होंने इस उम्र में बच्चे को जन्म देने के लिए विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) तकनीक अपनाई है.
ऐसे में इस रिपोर्ट में विस्तार से समझते हैं कि आखिर ये क्या है आईवीएफ तकनीक क्या है और इसके जरिये प्रेगनेंसी कितना सफल है...
क्या है आईवीएफ
एबीपी ने आईवीएफ एक्सपर्ट डॉक्टर निभा सिंह से बातचीत की. इस दौरान उन्होंने बताया कि इस तकनीक के जरिये लैब में महिला की ओवरी से अंडे निकालकर पुरुष के स्पर्म के साथ फर्टिलाइजेशन कराया जाता है. फर्टिलाइजेशन के इस प्रक्रिया में ये जरूरी नहीं है कि महिला के शरीर से जितने भी अंडे निकल रहे हैं वह सभी भ्रूण में तब्दील हो.
कई बार भ्रूण बनने के बाद भी फ्रीजिंग के प्रोसेस तक वह सर्वाइव नहीं कर पाते हैं. ऐसे में इस प्रक्रिया के बाद जो अच्छे क्वालिटी के भ्रूण होते हैं उसे ही महिला के गर्भाशय में डाला जाता है, ऐसा करने से उनकी प्रेग्नेंसी का चांस ज्यादा रहता है.
आईवीएफ यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन को पहले टेस्ट ट्यूब बेबी कहा जाता था, इसलिए हो सकता है कि आप आज भी इसे टेस्ट ट्यूब बेबी के नाम से ही जानते हों. IVF यानी टेस्ट ट्यूब बेबी के तकनीक का सबसे पहला इस्तेमाल साल 1978 में इंग्लैंड में किया गया था और आज ये तकनीक न सिर्फ इंग्लैंड बल्कि दुनिया के उन सभी जोड़ो के लिए वरदान से कम नहीं है, जो सालों से प्रेगनेंसी की कोशिश के बावजूद सफल नहीं हो पा रहे हैं.

कब शुरू हुई आईवीएफ तकनीक, कैसे हुआ था इसका इजाद
आईवीएफ तकनीक का इजाद करने वाली महिला वैज्ञानिक का नाम है- मिरियम मेनकिन. मिरियम, हॉवर्ड यूनिवर्सिटी के फर्टिलिटी एक्सपर्ट डॉ. जॉन रॉक के साथ एक तकनीशियन के तौर पर काम करती थीं. उस वक्त उनका मकसद इंसानी शरीर के बाहर प्रजनन करने वाले ऐसे अंडाणुओं को उपजाऊ बनाना था, जिनमें बच्चे पैदा करने की क्षमता नहीं होती.
इस तकनीक के खोच में मरियम को पूरे 6 साल का वक्त लगा और सालों की मशक्कत और लगातार मिलने वाली नाकामियों के बाद फरवरी 1944 में मरियम को पहली कामयाबी मिली. आज इसी तकनीक को दुनियाभर में इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) तकनीक के नाम से जाना जाता है.
इस तकनीक की खोज के बाद साल 1978 में दुनिया का पहला इन विट्रो फर्टिलाइजर (आईवीएफ) तकनीक से बच्चा पैदा हुआ. उसका नाम लुईस ब्राउन रखा गया. इसके बाद साल 2017 में अमेरिका में सबसे ज्यादा 2,84,385 महिलाओं ने इस तकनीक से गर्भ धारण किया.
भारत में कैसे आई IVF टेक्नोलॉजी
भारत की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी 6 अगस्त 1986 को जन्मी थी. उसका नाम हर्षा चावड़ा रखा गया था. हर्षा वर्तमान में 37 साल की है और अब उनका बच्चा भी है.
प्रेग्नेंसी की ये तकनीक कितनी सफल है?
आईवीएफ एक्सपर्ट डॉक्टर निभा सिंह ने बताया कि वर्तमान में आईवीएफ की प्रक्रिया थोड़ी कठिन और महंगी है, लेकिन समय के साथ इस टेक्नोलॉजी के तहत बच्चा पैदा करने का सक्सेस रेट बढ़ता जा रहा है.
हालांकि इस प्रक्रिया के दौरान बहुत सारी बातों का ख्याल रखना पड़ता है, जैसे मां की सेहत कैसी है. उन्होंने कहा की महिला की उम्र भी यह तय करती है कि IVF की ये प्रक्रिया कितनी सफल होगी.
किस उम्र में कितना सक्सेस रेट
एक रिपोर्ट के अनुसार अगर आईवीएफ तकनीक के जरिये प्रेग्नेंट होने वाली महिला की उम्र 34 साल से कम है तो इस प्रक्रिया का सक्सेस रेट 40% हो जाता है. वहीं 35 से 37 साल की महिला अगर आईवीएफ तकनीक के जरिये प्रेगनेंसी चाहती हैं तो उनका सक्सेस रेट 31% और 38 ले 40 साल की महिलाओं का सक्सेस रेट 21%, 41 से 42 साल का 11% और 43 साल या उससे ज्यादा की महिलाओं का सक्सेस रेट 5% होता है.
क्या 58 साल की उम्र में IVF से मां बनना संभव है?
साल 2017: इस साल तक भारत में आईवीएफ करवाने के लिए महिला की उम्र 45 साल और पुरुष के लिए उम्र 50 साल थी.
साल 2020: इस साल नए एआरटी कानून लाए गए जिसके अनुसार महिलाओं के लिए इस तकनीक के जरिये गर्भधारण करने की अधिकतम सीमा 50 साल कर दी गई और पुरुषों के लिए यही सीमा 55 साल कर दी गई है.
भारत का एआरटी कानून 58 साल की महिला को IVF की अनुमति नहीं देती है. लेकिन कई ऐसे देश हैं जहां इस टेक्निक से प्रेगनेंसी धारण करने के लिए कोई कानून नहीं है.

किस परिस्थिति में एक महिला आईवीएफ से गर्भधारण करवा सकती है
डॉक्टर निभा के अनुसार IVF से गर्भाशय धारण करने के लिए महिला का यूट्रस हेल्दी होना बेहद जरूरी है. भ्रूण को गर्भाशय में पहुंचने के लिए मोटी एंडोमेट्रियम चाहिए होती है.
डॉक्टर के अनुसार मेनोपॉज के बाद महिलाओं में एंडोमेट्रियम पतली होने लगती है, जिससे उन्हें गर्भाशय धारण करने में समस्याएं हो सकती हैं. ऐसे अगर कोई महिला 50 की उम्र में IVF करवाना चाहती है तो सबसे पहले उन्हें एंडोमेट्रियम बढ़ाने के लिए डॉक्टर की निगरानी में ट्रीटमेंट करवाना पड़ता है.
इसके अलावा आमतौर पर महिलाओं को 50 की उम्र के बाद हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और हार्ट जैसे कई समस्याएं हो जाती है, ये भी एक कारण है कि इस बीमारियों के चलते IVF ट्रीटमेंट में समस्याएं हो सकती हैं.
क्या है IVF का पूरा प्रोसेस
स्टेप 1- IVF तकनीक से प्रेग्नेंट होने की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है. इसमें सबसे पहले महिला की ओवरी में बनने वाले एग को विकसित किया जाता है. इस एग के विकास के लिए महिला को कुछ इंजेक्शन दिए जाते हैं. इस प्रक्रिया की शुरुआत पीरियड्स के दूसरे दिन से ही कर दी जाती है और उन्हें लगातार 10 से 12 दिनों तक रोज इंजेक्शन लगाया जाता है.
हालांकि इन का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता है. इसके जरिये महिला को वह हॉर्मोन थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दिया जाता हैं जिससे उनके ओवरी में एग बन सके. इस दौरान अल्ट्रासाउंड के जरिए इस पूरी प्रक्रिया पर नजर रखी जाती है. इस पूरी प्रक्रिया को एग स्टिमुलेशन कहते हैं.
स्टेप 2- एग विकसित हो जाने के बाद उन्हें निकाल लिया जाता है. इस अंडे को निकालने के लिए भी केवल एक इंजेक्शन का इस्तेमाल किया जाता है.
स्टेप 3- इसके बाद महिला के पार्टनर का स्पर्म लिया जाता है और लैब में इसे महिला के सबसे स्वस्थ एग से मिला दिया जाता है, इस प्रक्रिया को निषेचन कहते हैं. ऐसा करने के 3 से 5 दिन में भ्रूण तैयार किया जाता है और एक बार भ्रूण तैयार हो गया तो उसे वापस महिला के गर्भ में रख दिया जाता है.
डॉक्टर निभा ने कहा कि इस प्रक्रिया में वैसे तो किसी भी प्रकार का दर्द नहीं होता, लेकिन कई बार हल्की से मरोड़ या ऐंठन महसूस होती है. हालांकि ऐसा होना काफी सामान्य है. भ्रूण स्थापित किए जाने के बाद महिला वापस अपनी नॉर्मल जिंदगी जी सकती हैं.

क्या होता है मल्टीपल प्रेगनेंसी
मल्टीपल प्रेगनेंसी को आसान भाषा में समझें तो IVF प्रक्रिया के तहत एक बार में एक से ज्यादा बच्चे हो सकते है और अगर ऐसा होता है तो इसका असर बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ने का खतरा बना रहता है.
इस प्रक्रिया में कितना खर्च होता है
भारत में आमतौर पर आईवीएफ तकनीक में 65,000 से 95,000 रुपए तक का खर्च आता है जबकि अफोर्डेबल आईवीएफ तकनीक से प्रजनन की कीमत 40,000 रुपए तक होती है. सामान्य आईवीएफ में आमतौर पर 10 से 12 अंडों का निर्माण किया जाता है जबकि अफोर्डेबल आईवीएफ में तीन से चार अंडों का निर्माण करते हैं.
दुनियाभर में लगभग 80 लाख बच्चें आईवीएफ प्रोसेस से ले रहे हैं जन्म
एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में हर साल आईवीएफ के जरिए लगभग 80 लाख बच्चे जन्म लेते हैं और वहीं भारत की बात करें तो इस देश में एक साल में 2 से 2.5 लाख लोगों का आईवीएफ फर्टिलिटी ट्रीटमेंट की मदद से माता-पिता बनने का सपना साकार होता है.
क्या आईवीएफ के पैदा हुए बच्चे कमजोर होते हैं?
इस सवाल के जवाब में डॉक्टर निभा कहती हैं कि वर्तमान में टेक्नोलॉजी ने काफी तरक्की कर ली है. हां कुछ लोगों को आज भी यही लगता है कि आईवीएफ बेबी नैचुरली कंसीव किए गए बच्चों से कमजोर होते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है टेस्ट ट्यूब बेबी और नैचुरल तरीके से हुए बच्चों में कोई फर्क नहीं होता है.