UP: ऐसा इत्र...लगाने से सर्दी हो जाएगी छूमंतर, कन्नौज में 500 सालों से जड़ी-बूटियों से बनाया जा रहा शमामा

एक इत्र ऐसा भी है, जिसको लगाने से ठंड दूर हो जाती है। सहसा यह विश्वास किसी को नहीं होगा, लेकिन इत्र और इतिहास की नगरी में एक ऐसा भी इत्र बनाया जा रहा है, जिसको लगाने मात्र से ठंड नहीं लगेगी और सर्दी-जुकाम छूमंतर हो जाएगा।

UP: ऐसा इत्र...लगाने से सर्दी हो जाएगी छूमंतर, कन्नौज में 500 सालों से जड़ी-बूटियों से बनाया जा रहा शमामा

एक इत्र ऐसा भी है, जिसको लगाने से ठंड दूर हो जाती है। सहसा यह विश्वास किसी को नहीं होगा, लेकिन इत्र और इतिहास की नगरी में एक ऐसा भी इत्र बनाया जा रहा है, जिसको लगाने मात्र से ठंड नहीं लगेगी और सर्दी-जुकाम छूमंतर हो जाएगा। यह देश के विभिन्न हिस्सों से लाई गईं 35 प्रकार की दुर्लभ जड़ी-बूटियों और गरम मसालों से बनाया जाता है, जिसको शमामा कहा जाता है।

शमामा की भारत से अधिक विदेशों में मांग है, जिससे यह खाड़ी देशों समेत विश्व के 56 देशों में निर्यात किया जा रहा है। हर साल शमामा की मांग बढ़ रही है। शमामा का अर्थ अरबी मूल में “उच्च स्थान” है, जिसका मतलब है कि जो इत्र में सबसे उच्च स्थान है, वह शमामा का है। अन्य सभी इत् फूलों से बनाए जाते हैं, लेकिन शमामा देसी जड़ी-बूटियों से तैयार होता है। ये जड़ी-बूटियां भारत के विभिन्न भागों से मंगाईं जाती हैं।

तैयार करने में करीब एक माह का लग जाता है समय

इनमें जायफल, जावित्री, दालचीनी, केसर लच्छा, नागर मोथा, जटामासी, काली मिर्च, दक्खिनी मिर्च, कपूर कचरी, काली इलायची, सुगंध मंथरी, सुगंधबाला, बालछड़ और कस्तूरी समेत 35 प्रकार की जडी-बूटियों का प्रयोग किया जाता है। इत्र निर्माताओं की माने तो अधिकतर जड़ी-बूटियां उत्तराखंड, हिमांचल, जम्मू-कश्मीर से आतीं हैं, जबकि कुछ दक्षिण भारत और विदर्भ क्षेत्र से भी लाईं जातीं हैं। पुरातन आसवन विधि से शमामा को तैयार करने में करीब एक माह का समय लग जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में शमामा दो से 2.5 लाख रुपये प्रतिकिलो तक है।

तासीर गर्म होने के कारण नही लगती सर्दी

आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. सलीम बताते हैं कि शमामा जड़ी-बूटियों और गरम मसालों से बनाया जाता है। इसको लगाने से सर्दी का एहसास नहीं होता है। इसकी खुशबू से जुकाम और सर्दी ठीक हो जाती है। इसके अलावा एंजाइटी व नींद न आने पर भी रामवाण का काम करता है। कई देशों में इसे सेक्सवर्धक के रूप में खाने के लिए प्रयोग भी किया जाता है।

चार हजार साल पहले तैयार किया गया था शमामा

इत्र निर्माता रंजन बाजपेयी बताते हैं कि शमामा को करीब चार हजार साल पहले कन्नौज में ही बनाया गया था। इसे औषधि के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। पहले एक-दो लोग ही इसे बनाते थे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग बढ़ी तो कई लोग तैयार करने लगे हैं। खाड़ी देशों में इसकी सर्वाधिक मांग है। देशों के अनुसार इसको तैयार कर उसकी ग्रेडिंग भी की गई है, जैसे कि शमामा रूह-960, शमामा अतर-916, शमामा गुलबदन-920 आदि से इसका निर्यात किया जाता है। अच्छे शमामा की कीमत बाजार में दो से 2.5 लाख रुपये प्रतिकिलो तक है। एक किलो शमामा तैयार करने में डेढ़ माह का वक्त लगता है।

शमामा की विश्व के सभी देशों में मांग है। कन्नौज से हर साल करोड़ों रुपये का शमामा विश्व के कई देशों में निर्यात होता है। वर्तमान में इसका प्रयोग पान मसालों और तंबाकू उत्पादों में भी होने लगा है। इसके अलावा इसका उपयोग आयुर्वेदिक औषधियों में भी होने लगा है।  -पवन त्रिवेदी, अध्यक्ष, द अतर्स एंड परफ्यूमर्स एसोसिएशन