कार्डियक अरेस्ट की भविष्यवाणी अब संभव, AI मॉडल ने रचा इतिहास
जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक नई AI तकनीक विकसित की है जो दिल के रोगियों में अचानक कार्डियक अरेस्ट की सटीक पहचान करने में डॉक्टरों से कहीं बेहतर साबित हुई है।
जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक अत्याधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मॉडल विकसित किया है जो दिल की बीमारियों से पीड़ित मरीजों में अचानक कार्डियक अरेस्ट की संभावना को डॉक्टरों की पारंपरिक पद्धतियों की तुलना में कहीं अधिक सटीकता से पहचान सकता है। इस मॉडल की खासियत यह है कि यह अब तक कम उपयोग की गई हृदय इमेजिंग तकनीकों के साथ-साथ मरीज की विस्तृत मेडिकल हिस्ट्री का विश्लेषण कर उस छिपी हुई जानकारी को उजागर करता है जो पारंपरिक जांच से सामने नहीं आ पाती थी।
इस अध्ययन का नेतृत्व कार्डियोलॉजी में AI के उपयोग पर केंद्रित वैज्ञानिक डॉ. नतालिया त्रायानोवा ने किया है, जिन्होंने बताया कि अभी भी कई ऐसे मरीज हैं जिन्हें सही समय पर सही इलाज नहीं मिल पाता, और कई ऐसे हैं जिन्हें डिफिब्रिलेटर लगाया जाता है जबकि उसकी जरूरत नहीं होती। उनका कहना है कि अब हमारे पास इतनी सटीकता से यह जानने की क्षमता है कि कौन से मरीज अचानक हृदयगति रुकने के सबसे अधिक जोखिम में हैं।
यह शोध ‘नेचर कार्डियोवैस्कुलर रिसर्च’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
AI मॉडल, जिसे MAARS (मल्टीमॉडल AI फॉर वेंट्रिकुलर अरेथमिया रिस्क स्ट्रैटिफिकेशन) नाम दिया गया है, MRI इमेजिंग में छुपे दिल के निशानों और स्कार्स की पहचान करता है, जिन्हें अब तक डॉक्टर नजरअंदाज करते रहे हैं। खासकर हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी जैसी आनुवंशिक हृदय बीमारियों में जहां एक छोटा प्रतिशत मरीज अचानक मौत के खतरे में रहते हैं, AI मॉडल इन मामलों को पहले से पहचान सकता है।
जहां मौजूदा मेडिकल गाइडलाइंस केवल 50% मामलों में सही साबित होती हैं, वहीं यह AI मॉडल 89% सटीकता के साथ काम करता है, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 40 से 60 वर्ष की उम्र के सबसे ज्यादा खतरे वाले मरीजों में इसकी सटीकता 93% है।
AI मॉडल की एक बड़ी उपलब्धि यह भी है कि यह केवल जोखिम की पहचान ही नहीं करता बल्कि यह भी बताता है कि मरीज हाई रिस्क में क्यों हैं, जिससे डॉक्टरों को मरीजों के लिए व्यक्तिगत इलाज योजनाएं तैयार करने में सहायता मिलती है।
शोधकर्ताओं की टीम ने इससे पहले 2022 में एक अन्य AI मॉडल भी तैयार किया था जो कार्डियक अरेस्ट से मृत्यु की संभावनाओं का पूर्वानुमान लगा सकता था। अब टीम इस नए MAARS मॉडल को और अधिक रोगियों पर परीक्षण करने और इसे अन्य प्रकार की हृदय बीमारियों जैसे कार्डियक सरकोइडोसिस और एरिद्मोजेनिक राइट वेंट्रिकुलर कार्डियोमायोपैथी में भी उपयोग करने की योजना बना रही है।
इस अनुसंधान में जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के साथ-साथ कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के हाइपरट्रॉफिक कार्डियोमायोपैथी सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और एट्रियम हेल्थ के विशेषज्ञों ने भी योगदान दिया। यह तकनीक भविष्य में कार्डियक देखभाल को पूरी तरह बदलने की क्षमता रखती है और हजारों जानें बचाने में सहायक हो सकती है।