महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ में भारत के प्राचीन मंदिरों पर 50 चित्रों की प्रदर्शनी का शुभारंभ
महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ, स्वराज संस्थान संचालनालय, मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग में भारत के प्राचीन मंदिरों पर आधारित 50 चित्रों की प्रदर्शनी का शुभारंभ हुआ। यह प्रदर्शनी 16 अक्टूबर से 16 नवंबर तक प्रतिदिन सुबह 10 से शाम 6 बजे तक खुली रहेगी।
उज्जैन। महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ, स्वराज संस्थान संचालनालय, मध्यप्रदेश शासन संस्कृति विभाग के तत्वावधान में भारत के प्राचीन मंदिरों पर आधारित 50 चित्रों की प्रदर्शनी का शुभारंभ हुआ। यह प्रदर्शनी 16 अक्टूबर से 16 नवंबर 2025 तक प्रतिदिन प्रातः 10 बजे से सायं 6 बजे तक विद्वानों, शोधार्थियों और जिज्ञासुओं के लिए खुली रहेगी।
प्राचीन विद्या और संस्कृति पर केंद्रित रही प्रदर्शनी
उद्घाटन अवसर पर मुख्य वक्ता प्रो. शिवशंकर मिश्र ने सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक आचार्य वररुचि के योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि
“सम्राट विक्रमादित्य का उत्कर्ष उनके समकालीन आचार्यों और कवियों के कारण ही संभव हुआ। न्यायप्रियता और शास्त्रसम्मत कार्यों ने उन्हें जनप्रिय शासक बनाया।”
उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन विद्या में अष्टादश विद्याओं का उल्लेख हमारे ऋषियों द्वारा किया गया था, और जब अन्य विषयों को जोड़ा जाए तो इनकी संख्या सैकड़ों तक पहुँचती है।
धर्म, विनय और वृद्धों की सेवा का महत्व
प्रो. मिश्र ने चाणक्य के प्रसिद्ध वाक्य का उल्लेख करते हुए कहा,
“सुख का मूल धर्म है, धर्म का मूल अर्थ है, अर्थ का मूल राज्य है, राज्य का मूल इन्द्रिय जय है और इन्द्रिय जय का मूल विनय है, जबकि विनय का मूल वृद्धों की सेवा है।”
उन्होंने कहा कि धर्माचरण और विनम्रता से ही शाश्वत सुख की प्राप्ति संभव है तथा संस्कृत के अध्ययन से व्यक्ति आत्मज्ञान और संस्कृति दोनों को समझ सकता है।
संस्कृत भाषा — भारतीय संस्कृति की आत्मा
प्रो. मिश्र ने कहा कि संस्कृत को जाने बिना भारत को नहीं जाना जा सकता।
“महर्षि पाणिनि का व्याकरण भाषा विज्ञान की नींव है। उनकी अष्टाध्यायी में चार हजार सूत्र हैं, जो चौदह महेश्वर सूत्रों पर आधारित हैं। इन्हीं के माध्यम से भाषा विज्ञान का निर्माण हुआ।”
उन्होंने बताया कि आचार्य वररुचि (कात्यायन) ने “पत्र कौमुदी” और “लिंग विशेष विधि” जैसे ग्रंथों की रचना सम्राट विक्रमादित्य के आदेश पर की थी, जिनमें भाषा और लिंग विज्ञान पर विस्तार से चर्चा की गई है। इसके अलावा उन्होंने विद्यासुंदर काव्य, निरुक्त समुच्चय और नीति रत्न जैसे कई महत्वपूर्ण ग्रंथ भी लिखे।
संस्कृति और विद्या के संगम का प्रतीक कार्यक्रम
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. प्रशांत पुराणिक ने की, जबकि इस अवसर पर संगोष्ठी के निदेशक डॉ. रमण सोलंकी, डॉ. महेंद्र पंड्या, रितेश वर्मा और शुभम अहिरवार उपस्थित रहे।
इस प्रदर्शनी ने भारत की प्राचीन स्थापत्य कला, धर्म, दर्शन और संस्कृति की अमूल्य विरासत को उजागर किया।
महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ द्वारा आयोजित यह आयोजन न केवल कला प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र है, बल्कि संस्कृत भाषा और भारतीय परंपरा की गहराई को समझने का एक सशक्त प्रयास भी है।