कंदाहा सूर्य मंदिर: भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब द्वारा स्थापित द्वापर युगीन धरोहर

सहरसा जिले के कंदाहा स्थित प्राचीन सूर्य मंदिर का इतिहास द्वापर युग से जुड़ा है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने इसकी स्थापना की थी।

कंदाहा सूर्य मंदिर: भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब द्वारा स्थापित द्वापर युगीन धरोहर

सहरसा जिले के महिषी प्रखंड के कंदाहा गांव में स्थित प्राचीन सूर्य मंदिर अपनी ऐतिहासिक, धार्मिक और वास्तुकला की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण धरोहर मानी जाती है। स्थानीय पुजारियों और इतिहासकारों का मानना है कि इस मंदिर का निर्माण द्वापर युग में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने करवाया था। परंपरा के अनुसार, साम्ब ने बारह राशियों के अनुरूप बारह सूर्य मंदिरों की स्थापना की थी, जिनमें से प्रथम मेष राशि में निर्मित मंदिर यही कंदाहा का सूर्य मंदिर है।

कहा जाता है कि वैशाख मास में जब सूर्य देव मेष राशि में प्रवेश करते हैं, तो सूर्योदय के समय सूर्य की पहली किरण सीधे मंदिर में विराजमान भगवान भास्कर की प्रतिमा के हाथ में धारण किए गए चक्र पर पड़ती है। यह घटना आज भी स्थानीय श्रद्धालुओं और वैज्ञानिकों दोनों के लिए रहस्यमय और अद्भुत मानी जाती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वैदिक काल से ही पंचदेव उपासना में सूर्य देव का स्थान प्रथम देव के रूप में रहा है। समय के साथ उपासना पद्धतियों और धार्मिक मान्यताओं में परिवर्तन आया, परंतु सूर्य पूजा का महत्व कभी कम नहीं हुआ।

साउथ बिहार सेंट्रल यूनिवर्सिटी, गया के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. सुमित कुमार पाठक का कहना है कि —

“धर्म और राजनीति का हमेशा से गहरा संबंध रहा है। सत्ता परिवर्तन के साथ धार्मिक परंपराओं की दिशा भी बदलती रही है, जिससे समाज की आस्था और धार्मिक प्रवृत्तियों पर सीधा प्रभाव पड़ा।”

वहीं मिथिला क्षेत्र के पुरातात्विक इतिहास पर लंबे समय से शोध कर रहे शोधकर्ता मुरारी झा का कहना है कि —

“कर्णाट काल में सूर्य उपासना को विशेष महत्व दिया गया था। यही कारण है कि कोसी, मिथिला और सीमांचल क्षेत्रों में खुदाई के दौरान सूर्य देव की अनेक मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।”

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पूर्व पुरातत्वविद् डॉ. फणिकांत मिश्र ने जानकारी दी कि —

“कंदाहा के इस प्राचीन सूर्य मंदिर का जीर्णोद्धार पंद्रहवीं सदी के पूर्वार्ध में ओइनवर वंश के राजा नरसिंह देव के द्वारा कराया गया था। मंदिर के चौखटों पर अंकित शिलालेखों में राजा नरसिंह देव की प्रशंसा में संस्कृत श्लोक अंकित हैं।”

मंदिर परिसर के चारों ओर फैले प्राचीन टीले और मिट्टी से समय-समय पर पुरातात्विक अवशेषों का मिलना इस स्थल की ऐतिहासिक महत्ता को और बढ़ा देता है। इसी कारण बिहार कला, संस्कृति एवं युवा विभाग ने वर्ष 1982 में ही इस मंदिर को संरक्षित स्मारक के रूप में घोषित कर दिया था।

हाल ही में प्रदेश के पर्यटन मंत्रालय द्वारा जिले से मांगी गई प्रमुख पर्यटन स्थलों की सूची में भी कंदाहा सूर्य मंदिर का नाम शामिल किया गया है। इस निर्णय से न केवल मंदिर की पहचान पुनः जीवित होगी, बल्कि यह स्थल अब धार्मिक पर्यटन का एक नया केंद्र बनकर उभर सकता है।

कंदाहा सूर्य मंदिर आज भी श्रद्धा, इतिहास और आस्था का प्रतीक है — जहाँ प्राचीन परंपराएँ और आधुनिक शोध एक साथ सूर्य देव की भव्यता का आलोक फैलाते हैं।