छत्तीसगढ़ में भोजली पर्व: मित्रता, फसल और संस्कृति का संगम
छत्तीसगढ़ का लोकपर्व भोजली, अटूट मित्रता और अच्छी फसल की कामना का प्रतीक है। जानें कोटगढ़ में धूमधाम से हुए भोजली विसर्जन और इसकी सांस्कृतिक महत्ता।
छत्तीसगढ़ में भोजली पर्व का विशेष महत्व है, जिसे अटूट दोस्ती और अच्छी फसल की कामना के साथ मनाया जाता है। जांजगीर-चांपा जिले के अकलतरा ब्लॉक के ग्राम कोटगढ़ में इस वर्ष भी भोजली विसर्जन पर्व धूमधाम से आयोजित हुआ। ग्रामीणों ने श्रद्धा और उत्साह के साथ पूजा-अर्चना कर दशकों पुरानी इस परंपरा को जीवंत रखा।
भोजली पर्व की शुरुआत और परंपरा
भोजली पर्व की शुरुआत नाग पंचमी से होती है, जब ग्रामीण गेहूं के दानों को भिगोकर टोकरी में बोते हैं। इसे ‘भोजली बोना’ कहा जाता है और नौ दिनों तक विधि-विधान से पूजा की जाती है। मान्यता है कि भोजली का अच्छा होना समृद्ध फसल का संकेत देता है।
भोजली बोने के लिए कुम्हार के घर से विशेष मिट्टी लाई जाती है और महतो परिवार से टोकरी ली जाती है। सात दिनों की सेवा और पूजा के बाद रक्षाबंधन के अगले दिन भोजली का नदी या तालाब में विसर्जन किया जाता है।
मितान परंपरा – जीवनभर की मित्रता
इस पर्व का एक खास पहलू है ‘मितान’ बनना। भोजली विसर्जन के समय कान में भोजली रखकर दो लोग जीवनभर की दोस्ती निभाने का संकल्प लेते हैं। इसे स्थानीय संस्कृति में अटूट विश्वास और भाईचारे का प्रतीक माना जाता है।
कोटगढ़ में भोजली विसर्जन उत्सव
कोटगढ़ में आयोजित भोजली विसर्जन कार्यक्रम में महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में सज-धजकर भोजली माता की पूजा की, मंगलगीत गाए और भोजली को जल में विसर्जित किया। ग्रामीणों ने चंडी दाई मंदिर और महमाया मंदिर में भी पूजा-अर्चना कर मंगलकामनाएं कीं।
ग्रामवासियों और अतिथियों ने भोजली पर्व को कृषि, पर्यावरण और संस्कृति से जुड़े विरासत पर्व के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोने की अपील की। वरिष्ठ नागरिकों के अनुसार, कोटगढ़ में यह परंपरा गाँव की एकता और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक है।